श्रीभगवानुवाच
अहो अमी देववरामरार्चितं
पादाम्बुजं ते सुमन:फलार्हणम् ।
नमन्त्युपादाय शिखाभिरात्मन-
स्तमोऽपहत्यै तरुजन्म यत्कृतम् ॥ ५ ॥
अनुवाद
भगवान ने कहा: हे देवेश्वरों में श्रेष्ठ, देखो तो कैसे ये वृक्ष, जिनकी पूजा अमर देवता करते हैं, तुम्हारे चरणों पर अपना सिर झुकाए हुए हैं। ये वृक्ष अपने फलों और फूलों को देकर उस घोर अज्ञान को दूर करना चाहते हैं जिसके कारण उन्हें वृक्ष का जन्म लेना पड़ा है।
The Lord said: O best of the demigods, see how these trees, which are worshipped by the immortal gods, are bowing their heads at Your lotus feet. These trees are offering their fruits and flowers to You to remove the deep ignorance due to which they had to take birth as trees.
तात्पर्य
वृंदावन के वृक्ष सोच रहे थे कि पिछले अपराधों के कारण ही वे अब वृक्ष के रूप में जन्मे हैं और अचल होने के कारण वे भगवान कृष्ण के साथ वृंदावन क्षेत्र में उनके भ्रमण में उनका साथ नहीं दे सकते हैं। वास्तव में, वृक्ष और गायों सहित वृंदावन के सभी जीव महान आत्माएँ थे जो स्वयं सर्वोच्च ईश्वर के व्यक्तित्व से जुड़ सकते थे। लेकिन विरह की भावुक भावनाओं के कारण, वृक्ष खुद को अज्ञानता में मानते थे और इस तरह कृष्ण और बलराम के कमल चरणों में झुककर खुद को पवित्र करने का प्रयास करते थे। भगवान कृष्ण ने उनकी मानसिकता को समझते हुए, स्नेह से उन्हें देखा और अपने बड़े भाई, बलराम के सामने उनकी भक्ति सेवा की प्रशंसा की।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥