श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 13: ब्रह्मा द्वारा बालकों तथा बछड़ों की चोरी  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  10.13.50 
चन्द्रिकाविशदस्मेरै: सारुणापाङ्गवीक्षितै: ।
स्वकार्थानामिव रज:सत्त्वाभ्यां स्रष्टृपालका: ॥ ५० ॥
 
 
अनुवाद
चाँद की बढ़ती चमक की तरह ऊर्जा से युक्त वे विष्णु रूप, अपनी शुद्ध मुस्कान और अपनी लालिमा लिए हुए आँखों की तिरछी चितवन से, अपने भक्तों की इच्छाओं को, मानो रजोगुण और सत्वगुण से, उत्पन्न करते और पालते थे।
 
चाँद की बढ़ती चमक की तरह ऊर्जा से युक्त वे विष्णु रूप, अपनी शुद्ध मुस्कान और अपनी लालिमा लिए हुए आँखों की तिरछी चितवन से, अपने भक्तों की इच्छाओं को, मानो रजोगुण और सत्वगुण से, उत्पन्न करते और पालते थे।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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