इस अध्याय के लिए अतिरिक्त नोट्स
आत्मा के स्थानांतरण के संबंध में, श्रील माधवाचार्य निम्नलिखित नोट्स देते हैं। जब कोई जागता है, जो कुछ भी वह देखता या सुनता है वह मन पर अंकित हो जाता है, जो बाद में सपनों में काम करता है ताकि उसे अलग-अलग अनुभव दिखाए जाएं, हालाँकि सपनों में वह एक अलग शरीर को स्वीकार करता प्रतीत होता है। उदाहरण के लिए, जब कोई जाग रहा होता है तो वह व्यवसाय करता है और ग्राहकों से बात करता है, और इसी तरह सपनों में वह विभिन्न ग्राहकों से मिलता है, व्यापार के बारे में बात करता है और उद्धरण देता है। इसलिए माधवाचार्य कहते हैं कि सपने उसी के अनुसार होते हैं जो कोई देखता है, सुनता है और याद रखता है। जब कोई फिर से जागता है, तो निश्चित रूप से, वह सपने के शरीर को भूल जाता है। इस भूलने को अपस्मृति कहा जाता है। इस प्रकार हम शरीर बदल रहे हैं क्योंकि हम कभी-कभी सपने देख रहे हैं, कभी जागते हैं और कभी भूल जाते हैं। हमारे पहले से निर्मित शरीर को भूलना मृत्यु कहलाता है, और वर्तमान शरीर में हमारा कार्य जीवन कहलाता है। मृत्यु के बाद, कोई अपने पिछले शरीर की गतिविधियों को याद नहीं रख सकता, चाहे वह काल्पनिक हो या तथ्यात्मक। अशांत मन की तुलना अशांत पानी से की जाती है जो सूर्य और चंद्रमा को प्रतिबिंबित करता है। वास्तव में पानी पर परिलक्षित सूर्य और चंद्रमा वहाँ मौजूद नहीं होते हैं; फिर भी, वे पानी की हरकतों के अनुसार परिलक्षित होते हैं। इसी तरह, जब हमारे मन अशांत होते हैं, तो हम विभिन्न भौतिक वातावरण में भटकते हैं और विभिन्न प्रकार के शरीर प्राप्त करते हैं। भगवद-गीता में इसे गुण-संग के रूप में वर्णित किया गया है। कारणं गुण-संगो यस्य। माधवाचार्य कहते हैं, गुण-नबद्ध: सान। और श्री चैतन्य महाप्रभु कहते हैं, ब्रह्मांड भ्रमिते कोण भाग्यवान जीव (सीसी. मध्य 19.151)। जीवित इकाई पूरे ब्रह्मांड में ऊपर और नीचे घूमती है, कभी ऊपरी ग्रहीय प्रणाली में, कभी मध्य और निचली ग्रहीय प्रणालियों में, कभी एक आदमी के रूप में, कभी एक देवता, कुत्ते, पेड़ वगैरह। यह सब दिमाग की उत्तेजना के कारण है। इसलिए मन को स्थिर रूप से स्थिर रखना चाहिए। जैसा कि कहा गया है, सा वै मनः कृष्ण-पदारविंदयोः। मनुष्य को अपना मन कृष्ण के चरण कमलों में स्थिर करना चाहिए, और फिर वह क्षोभ से मुक्त हो जाएगा। यह गरुड़ पुराण का निर्देश है, और नारदीय पुराण में इसी प्रक्रिया का वर्णन किया गया है। जैसा कि भगवद-गीता में कहा गया है, यांति देव-व्रता देवान। अशांत मन विभिन्न ग्रहीय प्रणालियों में जाता है क्योंकि यह विभिन्न प्रकार के देवताओं से जुड़ा होता है, लेकिन कोई भी देवताओं की पूजा करके भगवान के परम व्यक्तित्व के निवास पर नहीं जाता है, क्योंकि इसका समर्थन किसी भी वैदिक साहित्य द्वारा नहीं किया जाता है। मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता स्वयं होता है। इस मानव जीवन में वह सुविधा है जिसके साथ कोई अपनी वास्तविक स्थिति को समझ सकता है, और कोई यह तय कर सकता है कि ब्रह्मांड में हमेशा के लिए भटकना है या घर वापस, भगवान के पास लौटना है। इसकी पुष्टि भगवद-गीता (अपराप्य माम निवर्तन्ते मृत्यु-संसार-वर्त्मनी) में भी की गई है। मौका जैसी कोई चीज़ नहीं होती। जब जंगल की आग में एक पेड़ जल रहा होता है और हालांकि निकटतम पेड़ बच जाता है तो दूर का पेड़ आग पकड़ लेता है, यह मौका लग सकता है। इसी तरह, किसी को संयोग से विभिन्न प्रकार के शरीर मिलते प्रतीत हो सकते हैं, लेकिन वास्तव में ये शरीर मन के कारण मिलते हैं। मन स्वीकार करने और अस्वीकार करने के बीच टिमटिमाता है, और मन की स्वीकृति और अस्वीकृति के अनुसार, हमें विभिन्न प्रकार के शरीर प्राप्त होते हैं, हालाँकि हम सतही तौर पर इन शरीरों को संयोग से प्राप्त करते दिखाई देते हैं। भले ही हम मौके के सिद्धांत को स्वीकार करते हैं, शरीर बदलने का तात्कालिक कारण मन की उत्तेजना है।
अंश के बारे में नोट्स। इस अध्याय में वर्णन किया गया है कि कृष्ण अपने भागों और पार्सलों या अपने आंशिक प्रकटीकरण के साथ अंशेन प्रकट हुए। इस संबंध में, श्रीधर स्वामी कहते हैं कि कृष्ण सौ प्रतिशत भगवान हैं (कृष्णस्तु भगवान स्वयं)। हालाँकि, हमारी अपूर्णताओं के कारण, हम कृष्ण की पूर्णता की सराहना नहीं कर सकते हैं, और इसलिए जब कृष्ण पृथ्वी पर उपस्थित थे तो जो कुछ भी उन्होंने प्रदर्शित किया वह उनके वैभव का आंशिक प्रकटीकरण था। फिर से, कृष्ण अपने पूर्ण विस्तार वाले बलदेव के साथ प्रकट हुए। हालाँकि, कृष्ण पूर्ण हैं; उनके आंशिक रूप से प्रकट होने का कोई प्रश्न ही नहीं है। वैष्णव-तोषणी में, श्रील सनातन गोस्वामी कहते हैं कि यह स्वीकार करना कि कृष्ण आंशिक रूप से प्रकट हुए थे, कृष्णस्तु भगवान स्वयं कथन का खंडन करेगा। श्रील जीव गोस्वामी कहते हैं कि अंशेन शब्द का अर्थ है कि कृष्ण अपने सभी पूर्ण विस्तारों के साथ प्रकट हुए। अंशेन विष्णोः शब्दों का अर्थ यह नहीं है कि कृष्ण विष्णु के आंशिक प्रतिनिधि हैं। बल्कि, कृष्ण पूर्ण रूप से प्रकट हुए, और वे वैकुंठलोक में आंशिक रूप से प्रकट होते हैं। दूसरे शब्दों में, भगवान विष्णु कृष्ण का आंशिक प्रतिनिधित्व हैं; कृष्ण विष्णु का आंशिक प्रतिनिधित्व नहीं हैं। चैतन्य-चरितामृत, आदि-लीला, अध्याय चार में, इस विषय को बहुत स्पष्ट रूप से समझाया गया है। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर भी नोट करते हैं कि कोई भी कृष्ण का पूर्ण रूप से वर्णन नहीं कर सकता है। श्रीमद-भागवत में जो भी वर्णन हम पाते हैं वह कृष्ण के आंशिक स्पष्टीकरण हैं। इसलिए, अंत में, अंशेन शब्द इंगित करता है कि भगवान विष्णु कृष्ण का आंशिक प्रतिनिधित्व हैं, न कि कृष्ण विष्णु का आंशिक प्रतिनिधित्व हैं।
श्रील सनातन गोस्वामी की वैष्णव-तोषणी ने धर्म-शीलस्य शब्द को समझाया है। धर्म-शील का सही अर्थ है "एक निष्कलंक भक्त।" वास्तविक धर्म में कृष्ण के प्रति पूर्ण आत्मसमर्पण होता है (सर्व-धर्मान् पर्यत्याज्य माम एकं शरणं व्रजा)। जो व्यक्ति कृष्ण के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित हो गया है वह वास्तव में धार्मिक है। ऐसा ही एक धार्मिक व्यक्ति महाराज परीक्षित थे। जो कोई भी धर्म की अन्य सभी प्रणालियों को त्याग कर भगवान के चरण कमलों के समर्पण के सिद्धांत को स्वीकार करता है, वह वास्तव में धर्म-शील है, पूरी तरह से धार्मिक है।
निवृत्त-तषर्हि शब्द उस व्यक्ति को संदर्भित करता है जिसे अब कोई भौतिक इच्छा नहीं है (सर्वोपाधि-विर्निर्मुक्तम)। इस भौतिक दुनिया में दूषित होने के कारण किसी में भी कई भौतिक इच्छाएं हो सकती हैं, लेकिन जब कोई सभी भौतिक इच्छाओं से पूरी तरह मुक्त हो जाता है, तो उसे निवृत्त-तृष्ण कहा जाता है, जो इंगित करता है कि उसे अब भौतिक भोग की कोई प्यास नहीं है। स्वामी कृतार्थोस्मि वरं ना याचे (हरि-भक्ति-सुधोदय)। भौतिकवादी व्यक्ति भक्ति सेवा करने से कुछ भौतिक लाभ चाहते हैं, लेकिन यही सेवा का उद्देश्य नहीं है। भक्ति सेवा की सिद्धि कृष्ण के चरण कमलों में पूर्ण समर्पण में निहित है, जिसमें कोई भौतिक इच्छा नहीं है। जो इस तरह से आत्मसमर्पण करता है वह पहले से ही मुक्त है। जीवन-मुक्तः स उच्यते। जो व्यक्ति हमेशा कृष्ण की सेवा में व्यस्त रहता है, चाहे वह किसी भी स्थिति में रहे, उसे इस जीवन में भी मुक्त समझा जाता है। ऐसा व्यक्ति, जो एक शुद्ध भक्त है, उसे अपना शरीर बदलने की आवश्यकता नहीं होती है; वास्तव में, उसके पास भौतिक शरीर नहीं होता है, क्योंकि उसका शरीर पहले ही आध्यात्मिक हो चुका होता है। आग में लगातार रखी गई एक लोहे की छड़ अंततः आग बन जाएगी, और वह जो कुछ भी छूएगी वह जल जाएगी। इसी तरह, शुद्ध भक्त आध्यात्मिक अस्तित्व की आग में है, और इसलिए उसका शरीर चिन-माया है; अर्थात, यह आध्यात्मिक है, भौतिक नहीं, क्योंकि शुद्ध भक्त की कोई इच्छा नहीं है सिवाय भगवान की सेवा करने की पारलौकिक इच्छा के। चौथे पाठ में उपगीयमान्त का प्रयोग किया गया है: निवृत्त-तषैरुपगीयमान्त। भक्त न हो तो प्रभु के गुण कौन गाएगा? इसलिए निवृत्त-तर्षैर शब्द भक्त को इंगित करता है, और किसी को नहीं। विराराघव आचार्य और विजयध्वज जैसे आचार्यों की ये टिप्पणियाँ हैं। भक्ति सेवा के अतिरिक्त कुछ भी चाहने से भौतिक इच्छाओं से उसका स्वतंत्रता कम हो जाएगी, लेकिन जब कोई ऐसी सभी इच्छाओं से मुक्त हो जाता है तो उसे निवृत्त-तर्षैर कहा जाता है।
विना पशु-घ्नात्। पशु शब्द का अर्थ है "पशु"। पशु हत्यारा, पशु-घ्न कृष्ण भावना में प्रवेश नहीं कर सकता है। इसलिए, हमारे कृष्ण भावना आन्दोलन में पशु हत्या पूरी तरह से निषिद्ध है।
उत्तमश्लोक-गुणानुवादात्। उत्तमश्लोक शब्द का अर्थ है "जो अच्छे लोगों में श्रेष्ठ के रूप में प्रसिद्ध है।" प्रभु सभी परिस्थितियों में अच्छे हैं। यही उनकी स्वाभाविक प्रतिष्ठा है। उनकी अच्छाई असीमित है, और वे इसका असीमित रूप से उपयोग करते हैं। एक भक्त को भी कभी-कभी उत्तमश्लोक के रूप में वर्णित किया जाता है, जिसका अर्थ है कि वह भगवान या भगवान के भक्तों की महिमा करने के लिए उत्सुक है। भगवान की महिमा करना और भगवान के भक्तों की महिमा करना एक ही है। या, बल्कि, भक्त की महिमा करना सीधे भगवान की महिमा करने से अधिक महत्वपूर्ण है। नरोत्तम दास ठाकुर इस तथ्य की व्याख्या करते है: चाडिया वैष्णव-सेवा, निस्तार पाएचे केबा। कृष्ण के भक्त की निष्ठापूर्वक सेवा किए बिना व्यक्ति भौतिक दूषण से मुक्त नहीं हो सकता।
भवौषधात् का अर्थ है "सार्वभौमिक उपाय से"। पवित्र नाम जपना और सर्वोच्च भगवान की महिमा करना भौतिकवादी जीवन के सभी दुखों का सार्वभौमिक उपाय है। जो व्यक्ति इस भौतिक दुनिया से मुक्त होना चाहते हैं उन्हें मुमुक्षु कहा जाता है। ऐसे व्यक्ति भौतिकवादी जीवन के दुखों को समझ सकते हैं, और भगवान की गतिविधियों का महिमामंडन करके उन्हें इन सभी दुखों से मुक्त किया जा सकता है। प्रभु के नाम, प्रसिद्धि, स्वरूप, गुणों और सामग्री से संबंधित पारलौकिक ध्वनि कंपन सभी प्रभु से भिन्न नहीं हैं। इसलिए प्रभु के महिमामंडन और नाम के ध्वनि कंपन कानों को प्रिय लगते हैं, और प्रभु के नाम, स्वरूप और गुणों की पूर्ण प्रकृति को समझने से भक्त आनंदित होते हैं। हालाँकि, जो लोग भक्त नहीं हैं, वे भी प्रभु की पारलौकिक गतिविधियों के सुखद वर्णनों का आनंद लेते हैं। कृष्ण भावनामृत में बहुत अधिक उन्नत नहीं होने वाले साधारण लोग भी श्रीमद-भागवत में वर्णित वर्णनों का वर्णन करने में आनंद लेते हैं। जब एक भौतिकवादी व्यक्ति इस तरह से शुद्ध होता है, तो वह भगवान के गौरव को सुनने और जपने में संलग्न होता है। क्योंकि प्रभु के लीलाओं का महिमामंडन भक्त के कानों और हृदय को बहुत प्रिय है, यह एक साथ उसकी विषय और वस्तु है।
इस दुनिया में तीन प्रकार के लोग हैं: जो मुक्त हैं, जो मुक्त होने की कोशिश कर रहे हैं, और जो इंद्रिय भोग में उलझे हुए हैं। इन तीनों में से, जो पहले से ही मुक्त हैं, वे प्रभु के पवित्र नाम का जप और सुनते हैं, यह जानते हुए कि प्रभु की महिमा करना खुद को आध्यात्मिक स्थिति में रखने का एकमात्र तरीका है। जो मुक्त होने की कोशिश कर रहे हैं, दूसरा वर्ग, प्रभु के पवित्र नाम को जपने और सुनने को मुक्ति की प्रक्रिया मान सकते हैं, और वे भी इस प्रक्रिया के पारलौकिक आनंद को महसूस करेंगे। कर्मियों और कामुकता में लगे व्यक्तियों के लिए, वे भी प्रभु की लीलाओं को सुनने में आनंद ले सकते हैं, जैसे कुरुक्षेत्र के युद्ध के मैदान पर उनका युद्ध और गोपियों के साथ वृन्दावन में उनका नृत्य।
उत्तमश्लोक-गुणानुवाद शब्द सर्वोच्च भगवान के पारलौकिक गुणों को दर्शाता है, जैसे माँ यशोदा के लिए उनका स्नेह और उनके दोस्त ग्वाले और गोपियों के प्रति उनका प्रेमपूर्ण रवैया। महाराजा युधिष्ठिर जैसे भगवान के भक्तों को भी उत्तमश्लोक-गुणानुवाद योग्यता द्वारा वर्णित किया जाता है। अनुवाद शब्द का तात्पर्य सर्वोच्च भगवान या उनके भक्तों के गुणों का वर्णन करने से है। जब इन गुणों का वर्णन किया जाता है, तो अन्य भक्त उन्हें सुनने में रुचि रखते हैं। जितना अधिक कोई इन पारलौकिक गुणों के बारे में सुनने में रुचि रखता है, उतना ही अधिक वह पारलौकिक आनंद लेता है। इसलिए, सभी को, मुमुक्षु, विमुक्त और कर्मियों सहित, प्रभु की महिमा का जप और श्रवण करना चाहिए, और इस तरह से सभी को लाभ होगा।
यद्यपि भगवान के अलौकिक गुणों की ध्वनि सभी के लिए समान रूप से लाभकारी है, फिर भी जो मुक्त है उनके लिए यह अति प्रिय है। जैसे कि श्रीमद-भागवतम् अष्टम स्कंद तृतीय अध्याय के 20वें श्लोक में बताया गया है, क्योंकि शुद्ध भक्त जिनकी अब कोई सांसारिक इच्छा नहीं रहती, वे भगवान के चरण कमलों में पूरी तरह से समर्पण कर देते हैं। वे हमेशा भगवान के पवित्र नाम का जप और श्रवण करके परमानंद के सागर में विलीन रहते हैं। इस श्लोक के अनुसार, नारद जैसे भक्त और श्वेतद्वीप के अन्य निवासी हमेशा भगवान के पवित्र नाम का जप करते हुए दिखाई देते हैं क्योंकि इस तरह के जप से वे हमेशा बाहरी और आंतरिक रूप से आनंदित रहते हैं। मुमुक्षु, जो मुक्त होने की इच्छा रखते हैं, इंद्रियों के सुखों पर निर्भर नहीं रहते; इसके बजाय, वे भगवान के पवित्र नाम का जाप करके मुक्त होने पर पूरी तरह ध्यान केंद्रित करते हैं। कर्मी अपने कानों और दिलों को प्रिय कुछ बनाना पसंद करते हैं, और यद्यपि वे कभी-कभी भगवान के गुणों का जप या श्रवण करना पसंद करते हैं, वे इसे खुले तौर पर नहीं करते हैं। हालाँकि, भक्त हमेशा सहज रूप से भगवान की गतिविधियों को सुनते, उनका जप करते और उन्हें याद रखते हैं, और इस प्रक्रिया से वे पूरी तरह से संतुष्ट रहते हैं, भले ही वे इंद्रिय तृप्ति के विषय जैसे लग सकते हैं। भगवान की गतिविधियों के अलौकिक वर्णन को सुनकर, परीक्षित महाराज को मुक्ति मिल गई। इसलिए वे श्रोत्रमनोऽभिराम थे; अर्थात, उन्होंने श्रवण की प्रक्रिया का महिमामंडन किया। इस प्रक्रिया को सभी जीवित संस्थाओं को स्वीकार करना चाहिए। उन व्यक्तियों से भेद करने के लिए जो इन अलौकिक सुखों से वंचित हैं, परीक्षित महाराज ने विरज्येत पुमान शब्दों का प्रयोग किया है। पुमान शब्द किसी भी व्यक्ति को संदर्भित करता है, चाहे वह पुरुष हो, महिला हो या बीच का। जीवन की शारीरिक अवधारणा के कारण, हम विलाप के अधीन हैं, लेकिन जिसकी ऐसी कोई शारीरिक अवधारणा नहीं है वह अलौकिक श्रवण और जप में आनंद ले सकता है। इसलिए एक व्यक्ति जो पूरी तरह से जीवन की शारीरिक अवधारणा में लीन है, निश्चित रूप से आध्यात्मिक प्रगति न करके खुद को मार रहा है। ऐसे व्यक्ति को पशु-घ्न कहा जाता है। विशेष रूप से आध्यात्मिक जीवन से पशु शिकारी बाहर रखे गए हैं, जो भगवान के पवित्र नाम को सुनने और जप करने में कोई रुचि नहीं रखते हैं। ऐसे शिकारी हमेशा दुखी रहते हैं, इस जीवन में और अगले जीवन में भी। इसलिए कहा जाता है कि एक शिकारी को न तो मरना चाहिए और न ही जीना चाहिए क्योंकि ऐसे व्यक्तियों के लिए जीवित रहना और मरना दोनों कष्टदायी है। पशु शिकारी सामान्य कर्मियों से बिल्कुल अलग होते हैं, और इस तरह उन्हें श्रवण और जप की प्रक्रिया से बाहर रखा गया है। विना पशु-घ्नात। वे भगवान के पवित्र नाम के जप और श्रवण के अलौकिक आनंद में प्रवेश नहीं कर सकते। महा-रथ शब्द एक महान नायक को संदर्भित करता है जो अकेले ग्यारह हजार अन्य नायकों से लड़ सकता है, और पाँचवें पाठ में पाए जाने वाले शब्द अतिरथ का अर्थ है जो असीमित संख्या में लड़ सकते हैं। इसका उल्लेख महाभारत में इस प्रकार किया गया है:
एकादश-सहस्राणि
योद्धयेद यस्तु धनुविनाम
अस्त्र-शस्त्र-प्रवीणश्च
महा-रथ इति स्मृतः
अमितान योद्धयेद यस्तु
सम्प्रोक्तऽतिरथस्तु सः
यह विवरण श्रील सनातन गोस्वामी द्वारा बृहद-वैष्णव-तोषणी में दिया गया है।
माया-मनुष्य (10.1.17) योग-माया से आवृत होने (नाहं प्रकाशः सर्वस्य योग-माया-समावृताः) के कारण, कभी-कभी कृष्ण को माया-मनुष्य कहा जाता है, यह संकेत करता है कि यद्यपि वे ईश्वर के सर्वोच्च स्वरूप हैं, वे एक साधारण व्यक्ति की तरह दिखाई देते हैं। एक गलतफहमी पैदा होती है क्योंकि योग-माया सामान्य जनता की दृष्टि को ढँक लेती है। सामान्य व्यक्ति की तुलना में प्रभु की स्थिति वास्तव में भिन्न होती है, क्योंकि यद्यपि वे एक साधारण व्यक्ति की तरह कार्य करते दिखाई देते हैं, वे हमेशा पारलौकिक होते हैं। माया शब्द "दया" को भी इंगित करता है, और कभी-कभी इसका अर्थ "ज्ञान" भी होता है। भगवान हमेशा सभी पारलौकिक ज्ञान से पूर्ण होते हैं, और इसलिए यद्यपि वे एक इंसान की तरह कार्य करते हैं, वे ईश्वर की परम हस्ती हैं, जो ज्ञान से परिपूर्ण हैं। अपनी मूल पहचान में, प्रभु माया के नियंत्रक हैं (मायाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते स-चराचरम)। इसलिए प्रभु को माया-मनुष्य कहा जा सकता है या ईश्वर की परम हस्ती , जो एक साधारण इंसान की तरह खेलती है, यद्यपि वे भौतिक और आध्यात्मिक ऊर्जा दोनों के नियंत्रक हैं। प्रभु सर्वोच्च व्यक्ति, पुरुषोत्तम हैं, लेकिन चूँकि हम योग-माया से भ्रमित हैं, वे एक साधारण व्यक्ति प्रतीत होते हैं। अंततः, हालाँकि, योग-माया एक गैर-भक्त को भी प्रभु को सर्वोच्च व्यक्ति, पुरुषोत्तम के रूप में समझने के लिए प्रेरित करती है। भगवद्-गीता में हम सर्वोच्च भगवान द्वारा दिए गए दो कथन पाते हैं। भक्तों के लिए, प्रभु कहते हैं,
तेषाँ सतत-युक्तानाँ
भजताँ प्रीति-पूर्वकम
ददामि बुद्धि-योगं तं
येन मामुपयान्ति ते
"जो लोग निरंतर समर्पित हैं और प्रेम से मेरी पूजा करते हैं, मैं उन्हें वह समझ देता हूँ जिसके द्वारा वे मेरे पास आ सकते हैं।" (भगवद् गीता 10.10) इस प्रकार, इच्छुक भक्त के लिए भगवान बुद्धि देते हैं जिससे उन्हें उन्हें समझने और ईश्वर के पास, घर वापस लौटने में मदद मिल सके। दूसरों के लिए, गैर-भक्तों के लिए, भगवान कहते हैं, मृत्युः सर्व-हरश चाम्: "मैं सर्व-लूटने वाला, अपरिहार्य मृत्यु हूं।" प्रह्लाद जैसे एक भक्त भगवान नृसिंहदेव की गतिविधियों का आनंद लेते हैं, जबकि प्रह्लाद के पिता, हिरण्यकश्यप जैसे गैर भक्त भगवान नृसिंहदेव के सामने मृत्यु को प्राप्त होते हैं। इसलिए प्रभु दो प्रकार से कार्य करते हैं, कुछ को बार-बार जन्म और मृत्यु के मार्ग पर भेजते हैं और कुछ को घर वापस, ईश्वर के पास भेजते हैं। काला शब्द, जिसका अर्थ "काला" होता है, सर्वोच्च ईश्वर कृष्ण के रंग को इंगित करता है। भगवान कृष्ण और भगवान रामचंद्र, जो दोनों काले दिखते हैं, अपने भक्तों को मुक्ति और पारलौकिक आनंद देते हैं। भौतिक शरीर रखने वालों में, कभी-कभी कोई अपनी इच्छा के अधीन मृत्यु को प्राप्त करने में सक्षम होता है। ऐसे व्यक्ति के लिए मृत्यु लगभग असंभव है क्योंकि कोई मरना नहीं चाहता। लेकिन यद्यपि भीष्मदेव के पास यह शक्ति थी, किंतु प्रभु की सर्वोच्च इच्छा से, भीष्म प्रभु की उपस्थिति में बहुत आसानी से मर गए। ऐसे भी कई राक्षस हुए हैं जिन्हें मोक्ष की कोई आशा नहीं थी, फिर भी कंस प्रभु की सर्वोच्च इच्छा से मोक्ष प्राप्त कर गए। कंस की तो बात ही क्या, पूतना ने भी मोक्ष प्राप्त किया और प्रभु की माँ के स्तर तक पहुँची। इसलिए परीक्षित महाराज प्रभु के बारे में सुनने के लिए बहुत उत्सुक थे, जिनमें किसी को भी मुक्ति देने के लिए अकल्पनीय गुण मौजूद हैं। परीक्षित महाराज, अपनी मृत्यु के समय निश्चित रूप से अपनी मुक्ति में रुचि रखते थे। जब प्रभु जैसे महान और ऊँचे व्यक्तित्व अकल्पनीय गुणों को रखने के बावजूद एक सामान्य इंसान की तरह व्यवहार करते हैं, तो उनके व्यवहार को माया कहा जाता है। इसलिए प्रभु को माया-मनुष्य के रूप में वर्णित किया गया है। यह श्रील जीव गोस्वामी की राय है। मु से मुक्ति का बोध होता है या मोक्ष का, और कु से उसका बोध होता है जो खराब या बहुत घृणित हो। इस प्रकार मुकु सर्वोच्च ईश्वर का उल्लेख करता है, जो भौतिक अस्तित्व की खराब स्थिति से बचाता है। प्रभु को मुकुंद कहा जाता है क्योंकि वे न केवल भक्तों को भौतिक अस्तित्व से बचाते हैं बल्कि उन्हें प्रेम और सेवा में पारलौकिक आनंद प्रदान करते हैं।
केशव के लिये, क का मतलब है ब्रह्मा और ईश का मतलब है भगवान शिव। व्यक्तिगत देवता भगवान ब्रह्मा और भगवान महादेव या शिव को अपने पारलौकिक गुणों द्वारा मोहित करते हैं। इसलिए उन्हें केशव कहा जाता है। यह राय सनातन गोस्वामी ने अपनी वैष्णव-तोषणी टीका में दी है।
ऐसा कहा जाता है कि सभी देवता, त्रि-नयन या भगवान शिव के साथ, समुद्र के किनारे गए और पुरुष-सूक्त के नाम से जाने जाने वाले मंत्र के माध्यम से अपनी प्रार्थना की पेशकश की। इस कथन से यह समझा जाता है कि देवता सीधे भगवान विष्णु के पास नहीं पहुँच सकते हैं जो समुद्र के दूध पर लेटे हैं, या उनके निवास में प्रवेश करते हैं। महाभारत, मोक्ष-धर्म और श्रीमद-भागवतम के अगले अध्याय में भी यह स्पष्ट रूप से कहा गया है। भगवान कृष्ण, सर्वोच्च व्यक्तिगत देवता, का गोलोक में निवास है (गोलोक-नामनि निजा-धामनि तले च तस्य)। भगवान कृष्ण से चतुर्-व्युह आते हैं, चौगुना विस्तार 4 -शंकरषण, अनिरुद्ध, प्रद्युम्न और वासुदेव। असंख्य ब्रह्मांड हैं, जो सभी कार्रोडकाषायी विष्णु के छिद्रों से निकलते हैं, और हर ब्रह्मांड में एक गर्भोदकाषायी विष्णु है, जो अनिरुद्ध का एक आंशिक विस्तार है। यह अनिरुद्ध प्रद्युम्न की आंशिक अभिव्यक्ति है, जो कि सभी जीवित संस्थाओं की आत्मा, क्षीरोदकाषायी विष्णु के रूप में आंशिक रूप से प्रतिनिधित्व करते हैं। ये विष्णु विस्तार कृष्ण से अलग हैं, जो गोलोक वृंदावन में निवास करते हैं। जब यह कहा जाता है कि देवताओं ने पुरुष-सूक्त का जाप करके भगवान को प्रार्थनाएँ कीं, तो यह इंगित करता है कि उन्होंने भक्ति प्रार्थनाओं का उच्चारण करके भगवान को प्रसन्न किया।
शब्द वृषाकपि उस व्यक्ति को संदर्भित करता है जो अपने भक्त को हर तरह से संतुष्ट करता है और अपने भक्त को सभी भौतिक चिंताओं से मुक्त करता है। वृष धार्मिक प्रदर्शनों जैसे कि बलिदान को संदर्भित करता है। यज्ञों के निष्पादन के बिना भी, भगवान अभी भी स्वर्गीय ग्रहों की सेवाओं का आनंद ले सकते हैं। यह कथन कि पुरुषोत्तम, जगन्नाथ, वासुदेव के घर में दिखाई देंगे सर्वोच्च व्यक्तिगत देवता को सामान्य व्यक्तियों से अलग करते हैं। कथन ने तुरंत संकेत किया कि उसने अपना पूर्ण विस्तार नहीं भेजा। शब्द प्रियार्थम इंगित करता है कि भगवान रुक्मिणी और राधारानी को खुश करने के लिए प्रकट हुए थे। प्रिया का अर्थ है "सबसे प्रिय"।
श्री वीरराघव आचार्य की टीका में, पाठ 23 के बाद निम्नलिखित अतिरिक्त छंद स्वीकार किए जाते हैं:
ऋषयोऽपि तदादेशात्
कल्प्यन्तां पशु-रूपिण:
पयो-दान-मुखेनैपि
विष्णुं तर्पयात सुर:
"हे देवताओं, यहां तक कि महान ऋषि भी, विष्णु के आदेश का पालन करते हुए, दूध देने के द्वारा सर्वोच्च व्यक्तिगत देवता को खुश करने के लिए गायों और बछड़ों के रूप में दिखाई देते हैं।"
रामानुजाचार्य कभी-कभी बलराम को एक शक्त्यावेश-अवतार के रूप में स्वीकार करते हैं, लेकिन श्रीला जीव गोस्वामी ने बताया है कि बलराम कृष्ण का विस्तार हैं और बलराम का एक भाग शंकरषण है। यद्यपि बलराम शंकरषण के समान हैं, वे शंकरषण की उत्पत्ति हैं। इसलिए स्वराट शब्द का उपयोग यह इंगित करने के लिए किया गया है कि बलराम हमेशा अपनी स्वतंत्रता में मौजूद रहते हैं। स्वराट शब्द यह भी इंगित करता है कि बलराम अस्तित्व की भौतिक अवधारणा से परे हैं। माया उन्हें आकर्षित नहीं कर सकती है, लेकिन क्योंकि वह पूरी तरह से स्वतंत्र हैं, वह अपनी आध्यात्मिक शक्ति से जहां चाहें वहां प्रकट हो सकते हैं। माया पूरी तरह से विष्णु के नियंत्रण में है। क्योंकि भौतिक शक्ति और योग-माया भगवान के रूप में मिलती हैं, उन्हें एकान्तश कहा जाता है। कभी-कभी एकांतश का अर्थ है "बिना भेद के"। शंकरषण और शेष-नाग समान हैं। यमुनदेवी द्वारा कहा गया है, "हे राम, हे महान-सशस्त्र विश्व के स्वामी, जिन्होंने पूरे ब्रह्मांड में खुद को एक पूर्ण विस्तार द्वारा फैलाया है, आपको पूरी तरह से समझना संभव नहीं है।" इसलिए एकांतश शेष-नाग को संदर्भित करता है। दूसरे शब्दों में, बलराम ने अपने आंशिक विस्तार से पूरे ब्रह्माण्ड को बनाए रखा।
शब्द "कार्यार्थे" का संबंध उससे है जिसने देवकी का गर्भ आकर्षित किया था और माता यशोदा को चकित कर दिया था। ये लीलाएँ बहुत गोपनीय हैं। ईश्वर के परम व्यक्तित्व ने योगमाया को आदेश दिया कि उनकी लीलाओं में उनके सहयोगियों को चकित करें और कंस जैसे राक्षसों को चकित करें। जैसा पहले बताया गया है, योगमायां समाधिशत। भगवान की सेवा करने के लिए योगमाया महामाया के साथ प्रकट हुईं। महामाया का उल्लेख "याय संमोहितं जगत्" के रूप में किया गया है, "वह जो पूरे भौतिक जगत को चकित करती है।" इस कथन से यह समझा जाना चाहिए कि योगमाया, अपने आंशिक विस्तार में, महामाया बन जाती हैं और सशर्त आत्माओं को चकित करती हैं। दूसरे शब्दों में, संपूर्ण सृष्टि में दो विभाजन हैं - दिव्य, या आध्यात्मिक, और भौतिक। योगमाया आध्यात्मिक दुनिया का प्रबंधन करती हैं, और महामाया के रूप में अपने आंशिक विस्तार से वह भौतिक दुनिया का प्रबंधन करती हैं। जैसा कि नारद-पंचरात्र में कहा गया है, महामाया योगमाया का एक आंशिक विस्तार है। नारद-पंचरात्र स्पष्ट रूप से बताता है कि परम व्यक्तित्व में एक शक्ति है, जिसे कभी-कभी दुर्गा के रूप में वर्णित किया जाता है। ब्रह्म-संहिता कहती है, 'छायेव यस्य भुवनानि बिभर्ति दुर्गा'। दुर्गा, योगमाया से भिन्न नहीं है। जब कोई दुर्गा को ठीक से समझता है, तो वह तुरंत मुक्त हो जाता है, क्योंकि दुर्गा मूल रूप से आध्यात्मिक शक्ति है, ह्लादिनी-शक्ति, जिसकी दया से व्यक्ति ईश्वर के परम व्यक्तित्व को बहुत आसानी से समझ सकता है। राधा कृष्ण-प्रणय-विकृतिर ह्लादिनी-शक्तिरस्माद। हालाँकि, महामाया-शक्ति योगमाया का एक आवरण है, और इसलिए उसे आवरण शक्ति कहा जाता है। इस आवरण शक्ति के द्वारा, संपूर्ण भौतिक जगत चकित हो जाता है (याया संमोहितं जगत्)। निष्कर्ष में, सशर्त आत्माओं को चकित करना और भक्तों को मुक्त करना दोनों ही योगमाया के कार्य हैं। देवकी के गर्भ को स्थानांतरित करना और माता यशोदा को गहरी नींद में रखना दोनों ही योगमाया ने किया था। महामाया ऐसे भक्तों पर कार्य नहीं कर सकती, क्योंकि वे हमेशा मुक्त रहते हैं। लेकिन यद्यपि महामाया के लिए मुक्त आत्माओं या ईश्वर के परम व्यक्तित्व को नियंत्रित करना संभव नहीं है, फिर भी उसने कंस को चकित कर दिया। कंस के सामने खुद को प्रस्तुत करने में योगमाया की क्रिया महामाया की क्रिया थी, योगमाया की नहीं। योगमाया ऐसे प्रदूषित व्यक्तियों को देख या छू भी नहीं सकती जैसे कंस। चंडी में, मार्कण्डेय पुराण, ग्यारहवें अध्याय में, महामाया कहती हैं, "वैवस्वत मनु की अवधि में अट्ठाईसवें युग के दौरान, मैं यशोदा की पुत्री के रूप में जन्म लूंगी और विंध्याचल-वासनी के रूप में जानी जाऊंगी।" दो मायाओं - योगमाया और महामाया - के बीच का भेद इस प्रकार वर्णित है। गोपियों के साथ कृष्ण की रास-लीला और अपने पति, ससुर और अन्य ऐसे रिश्तेदारों के संबंध में गोपियों का विचलन योगमाया की व्यवस्था थी जिसमें महामाया का कोई प्रभाव नहीं था। भागवतम् इसका पर्याप्त प्रमाण देता है जब यह स्पष्ट रूप से कहता है, योगमायाम् उपाश्रितः। दूसरी ओर, शल्व के नेतृत्व में असुर थे और दुर्योधन जैसे क्षत्रिय जो कृष्ण के वाहक गरुड़ और सार्वभौमिक रूप को देखने के बावजूद भक्ति सेवा से वंचित थे, और जो कृष्ण को ईश्वर के परम व्यक्तित्व के रूप में नहीं समझ सके। यह भी विचलन था, लेकिन यह विचलन महामाया के कारण था। इसलिए यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि जो माया किसी व्यक्ति को परम व्यक्तित्व ईश्वर से दूर ले जाती है उसे जड़-माया कहा जाता है, और जो माया दिव्य मंच पर कार्य करती है उसे योगमाया कहा जाता है। जब नंद महाराज को वरुण ले गए, तो उन्होंने कृष्ण की संपदा देखी, लेकिन फिर भी उन्होंने कृष्ण को अपने पुत्र के रूप में सोचा। आध्यात्मिक दुनिया में इस तरह की माता-पिता के प्रेम की भावनाएं योगमाया के कार्य हैं, जड़-माया के नहीं, या महामाया के। यह श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर की राय है। शूरसेनांश च। कार्तवीर्यार्जुन का पुत्र शूरसेन था, और जिन देशों पर उसने शासन किया उसे भी शूरसेन कहा जाता है। यह सनातन गोस्वामी ने अपने वैष्णव-तोषणी कमेंट्री में उल्लेख किया है। मथुरा के संबंध में, हमें यह उद्धरण मिलता है:
मथ्यते तु जगत् सर्वं
ब्रह्म-ज्ञानैन येन वा
तत्-सार-भूतं यद यस्यां
मथुरा सा निगद्यते
जब कोई आत्म-साक्षात्कारी आत्मा अपनी आध्यात्मिक स्थिति में कार्य करता है, तो उसकी स्थिति को मथुरा कहा जाता है। दूसरे शब्दों में, जब कोई भक्ति-योग की प्रक्रिया में कार्य करता है, तो वह कहीं भी रह सकता है, लेकिन वास्तव में वह मथुरा, वृंदावन में रहता है। नंद महाराज के पुत्र कृष्ण के प्रति भक्ति सभी ज्ञान का सार है, और जहाँ भी ऐसा ज्ञान प्रकट होता है, उसे मथुरा कहा जाता है। इसके अलावा, जब कोई अन्य सभी विधियों को छोड़कर भक्ति-योग स्थापित करता है, तो उसकी स्थिति को मथुरा कहा जाता है। यत्र नित्यं सन्नहितो हरिः: जिस स्थान पर हरि, भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व, शाश्वत रूप से रहता है, उसे मथुरा कहा जाता है। नित्य शब्द अनंत काल को इंगित करता है। परमेश्वर शाश्वत है, और उसका निवास भी शाश्वत है। गोलोक एव निवासत्य अखिलात्मा-भूतः। हालाँकि प्रभु हमेशा अपने निवास, गोलोक वृंदावन में स्थित रहते हैं, फिर भी वह पूर्णता में हर जगह उपस्थित हैं। इसका अर्थ यह है कि जब सर्वोच्च प्रभु संसार के धरातल पर अवतरित होते हैं, तो उनका मूल निवास खाली नहीं होता, क्योंकि वह अपने मूल निवास में रह सकते हैं और साथ ही मथुरा, वृंदावन, अयोध्या और अन्य स्थानों पर अवतरित हो सकते हैं। उन्हें अवतरित होने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वह वहां पहले से ही उपस्थित हैं; वह बस स्वयं को प्रकट करते हैं।
श्रील शुकदेव गोस्वामी ने महाराज परीक्षित को तात, या "प्रिय पुत्र" के रूप में संबोधित किया है। यह शुकदेव गोस्वामी के हृदय में माता-पिता के प्रेम के कारण है। क्योंकि कृष्ण जल्द ही वसुदेव और देवकी के पुत्र के रूप में आने वाले थे, माता-पिता के स्नेह से शुकदेव गोस्वामी ने महाराज परीक्षित को तात, "मेरे प्रिय पुत्र" के रूप में संबोधित किया।
विश्व-कोश शब्दकोश में, गर्भ शब्द को समझाया गया है: गर्भ भ्रूणे अर्भके कुक्षाव इति आदि। जब कंस देवकी को मारन
