श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 1: भगवान् श्रीकृष्ण का अवतार: परिचय  »  श्लोक 62-63
 
 
श्लोक  10.1.62-63 
नन्दाद्या ये व्रजे गोपा याश्चामीषां च योषित: ।
वृष्णयो वसुदेवाद्या देवक्याद्या यदुस्त्रिय: ॥ ६२ ॥
सर्वे वै देवताप्राया उभयोरपि भारत ।
ज्ञातयो बन्धुसुहृदो ये च कंसमनुव्रता: ॥ ६३ ॥
 
 
अनुवाद
हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ, महाराज परीक्षित, नन्द महाराज और उनके साथी ग्वाले तथा उनकी पत्नियाँ स्वर्गलोक के ही वासी थे। इसी तरह वसुदेव आदि वृष्णिवंशी और देवकी तथा यदुवंश की अन्य स्त्रियाँ भी स्वर्गलोक की वासी थीं। नन्द महाराज और वसुदेव के मित्र, रिश्तेदार, शुभचिंतक और ऊपर से कंस के अनुयायी दिखने वाले लोग सभी देवता ही थे।
 
हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ, महाराज परीक्षित, नन्द महाराज और उनके साथी ग्वाले तथा उनकी पत्नियाँ स्वर्गलोक के ही वासी थे। इसी तरह वसुदेव आदि वृष्णिवंशी और देवकी तथा यदुवंश की अन्य स्त्रियाँ भी स्वर्गलोक की वासी थीं। नन्द महाराज और वसुदेव के मित्र, रिश्तेदार, शुभचिंतक और ऊपर से कंस के अनुयायी दिखने वाले लोग सभी देवता ही थे।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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