श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 1: भगवान् श्रीकृष्ण का अवतार: परिचय  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  10.1.57 
कीर्तिमन्तं प्रथमजं कंसायानकदुन्दुभि: ।
अर्पयामास कृच्छ्रेण सोऽनृतादतिविह्वल: ॥ ५७ ॥
 
 
अनुवाद
वसुदेव इस भय से अत्यधिक विचलित थे कि यदि उन्होंने अपना वचन भंग कर दिया तो वे झूठे सिद्ध होंगे। इस प्रकार उन्होंने बड़ी ही पीड़ा के साथ अपने प्रथम पुत्र कीर्तिमान को कंस के हाथों सौंप दिया।
 
वसुदेव इस भय से अत्यधिक विचलित थे कि यदि उन्होंने अपना वचन भंग कर दिया तो वे झूठे सिद्ध होंगे। इस प्रकार उन्होंने बड़ी ही पीड़ा के साथ अपने प्रथम पुत्र कीर्तिमान को कंस के हाथों सौंप दिया।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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