श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 1: भगवान् श्रीकृष्ण का अवतार: परिचय  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  10.1.51 
अग्नेर्यथा दारुवियोगयोगयो-रदृष्टतोऽन्यन्न निमित्तमस्ति ।
एवं हि जन्तोरपि दुर्विभाव्य:शरीरसंयोगवियोगहेतु: ॥ ५१ ॥
 
 
अनुवाद
जब किसी अनदेखे कारण से आग लकड़ी के एक टुकड़े को जला के दूसरे टुकड़े को आग लगाती है तो उसकी वजह नियति होती है। उसी प्रकार जीव जब एक प्रकार के शरीर को स्वीकार कर दूसरे को त्यागता है, तो इसके पीछे भी किसी अदृश्य नियति के सिवा कोई दूसरा कारण नहीं होता है।
 
When due to some invisible reason fire leaps from one piece of wood and burns another piece, then the reason for this is destiny. Similarly, when a living being accepts one type of body and abandons another, then there is no other reason for this except the invisible destiny.
तात्पर्य
जब किसी गांव में आग लगती है, तो आग कभी एक घर को छोड़ कर दूसरे घर को जला देती है। इसी प्रकार जब जंगल में आग लगती है, तो आग कभी एक पेड़ को छोड़कर दूसरे पेड़ को पकड़ लेती है। ऐसा क्यों होता है, यह कोई नहीं बता सकता। कोई यह काल्पनिक कारण बता सकता है कि पास का पेड़ या घर आग नहीं पकड़ता तो भी दूर का पेड़ या घर आग पकड़ लेता है परंतु वास्तव में इसका कारण भाग्य है। यही कारण आत्मा के पुनर्जन्म पर भी लागू होता है, जिससे एक जीवन में प्रधानमंत्री अगले जीवन में कुत्ता बन जाता है। अदृश्य भाग्य के कार्य का व्यवहारिक प्रयोगात्मक ज्ञान द्वारा पता नहीं लगाया जा सकता है। इसलिए हमें इस तर्क से संतुष्ट होना चाहिए कि सब कुछ ईश्वर की सर्वोच्च इच्छा से होता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)