श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 1: भगवान् श्रीकृष्ण का अवतार: परिचय  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक  10.1.46 
श्रीशुक उवाच
एवं स सामभिर्भेदैर्बोध्यमानोऽपि दारुण: ।
न न्यवर्तत कौरव्य पुरुषादाननुव्रत: ॥ ४६ ॥
 
 
अनुवाद
शुकदेव गोस्वामी ने कहा: हे कुरुवंश में श्रेष्ठ, कंस अत्यंत क्रूर था और वास्तव में राक्षसों का अनुयायी था। इसलिए वसुदेव के अच्छे निर्देशों से उसे न तो समझाया जा सकता था और न ही डराया जा सकता था। इस जीवन या अगले जीवन में पापी कामों के परिणामों की उसे कोई परवाह नहीं थी।
 
शुकदेव गोस्वामी ने कहा: हे कुरुवंश में श्रेष्ठ, कंस अत्यंत क्रूर था और वास्तव में राक्षसों का अनुयायी था। इसलिए वसुदेव के अच्छे निर्देशों से उसे न तो समझाया जा सकता था और न ही डराया जा सकता था। इस जीवन या अगले जीवन में पापी कामों के परिणामों की उसे कोई परवाह नहीं थी।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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