श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 1: भगवान् श्रीकृष्ण का अवतार: परिचय  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  10.1.44 
तस्मान् कस्यचिद्‌‌द्रोहमाचरेत् स तथाविध: ।
आत्मन: क्षेममन्विच्छन् द्रोग्धुर्वै परतो भयम् ॥ ४४ ॥
 
 
अनुवाद
चूँकि ईर्ष्यालु और अधर्मी कार्यों के कारण ऐसा शरीर प्राप्त होता है जिसके कारण अगले जीवन में कष्ट भोगना पड़ता है, तो मनुष्य को अधर्मी कार्य क्यों करना चाहिए? अपने कल्याण को ध्यान में रखते हुए मनुष्य को किसी से ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए, क्योंकि ईर्ष्यालु व्यक्ति को इस जीवन में या अगले जीवन में अपने शत्रुओं से हमेशा नुकसान का डर लगा रहता है।
 
Since jealous and unholy acts lead to such a body which has to suffer in the next life, why should a man do unholy acts? Keeping his welfare in mind, a man should not be jealous of anyone because a jealous person is always afraid of harm from his enemies in this life or the next.
तात्पर्य
अन्य जीवधारियों के प्रति शत्रुतापूर्ण व्यवहार के बजाय, अपने कृत्यों द्वारा परमेश्वर की सेवा करना चाहिए जिससे इस जीवन और अगले जीवन में भयभीत स्थिति से बचा जा सकता है। इस संबंध में महान राजनीतिज्ञ चाणक्य पंडित का निम्नलिखित शिक्षाप्रद कथन बहुत अर्थपूर्ण है:

त्याग दुर्जन-संसर्गम्

भज साधु-समागमम्

करु पुण्यम् अहो रात्रम्

स्मर नित्यम् अनित्यताम्

व्यक्तियों को शैतानों, राक्षसों और भगवान में आस्था न रखने वालों के संग को छोड़ देना चाहिए और हमेशा भगवद्भक्तों और संतों के साथ जुड़ना चाहिए। व्यक्ति को हमेशा अपने कर्मों में धर्म का पालन करना चाहिए क्योंकि यह जीवन अस्थायी है और अस्थायी सुख और दुख से जुड़ना नहीं चाहिए। कृष्ण चेतना आन्दोलन मानव समाज को कृष्ण चेतना प्राप्त करने और इस प्रकार जीवन की समस्याओं का हमेशा के लिए समाधान करने का सिद्धांत सिखा रहा है (त्यक्त्वा देहं पुनर जन्म नैति माम एति सोऽर्जुन)।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)