श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 1: भगवान् श्रीकृष्ण का अवतार: परिचय  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  10.1.42 
यतो यतो धावति दैवचोदितंमनो विकारात्मकमाप पञ्चसु ।
गुणेषु मायारचितेषु देह्यसौप्रपद्यमान: सह तेन जायते ॥ ४२ ॥
 
 
अनुवाद
मृत्यु के समय मानव सकाम क्रियाकलापों में निहित उसके मन के सोचने, महसूस करने और चाहने के विचारों के अनुसार एक विशेष शरीर प्राप्त करता है। दूसरे शब्दों में, शरीर का विकास मन के क्रियाकलापों के अनुसार होता है। शरीर में बदलाव मन की चंचलता के कारण होते हैं, अन्यथा आत्मा मूल आध्यात्मिक शरीर में ही रह सकती है।
 
मृत्यु के समय मानव सकाम क्रियाकलापों में निहित उसके मन के सोचने, महसूस करने और चाहने के विचारों के अनुसार एक विशेष शरीर प्राप्त करता है। दूसरे शब्दों में, शरीर का विकास मन के क्रियाकलापों के अनुसार होता है। शरीर में बदलाव मन की चंचलता के कारण होते हैं, अन्यथा आत्मा मूल आध्यात्मिक शरीर में ही रह सकती है।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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