इस श्लोक में आत्मा के पुनर्वासन के विषय को स्पष्ट रूप से समझाया गया है। कई बार व्यक्ति अपने वर्तमान शरीर को भुला देता है और यौवन के शरीर, अतीत के शरीर, उसके क्रीड़ा कूद करने, बोलने आदि के विषय में विचार करता है। जब भौतिक शरीर विक्रिय हो जाता है, तब वह मिट्टी बन जाता है: "क्योंकि तू मिट्टी है, और तू मिट्टी में मिल जाएगा।" पर जब शरीर पुनः पाँच भौतिक तत्वों यानी पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश से मिल जाता है तब भी मन काम करता रहता है। मन एक सूक्ष्म तत्व है जिसके माध्यम से शरीर का निर्माण होता है, जैसा कि हम अपने स्वप्न में या जागने पर चिंतन करते समय अनुभव करते हैं। हमें इस बात को समझना चाहिए कि मानसिक अनुमान की प्रक्रिया एक नए प्रकार के शरीर को जन्म देती है जो वास्तव में होता नहीं है। यदि कोई व्यक्ति मन (मनोरथ) की प्रकृति और उसके सोचने, संवेदन और इच्छा करने की क्षमता को समझ सकता है, तो वह आसानी से समझ सकता है कि कैसे मन से विभिन्न प्रकार के शरीर बनते हैं।
इसलिए, कृष्ण भावना आंदोलन ऐसी पारलौकिक गतिविधियों की प्रक्रिया प्रदान करता है जिसमें मन कृष्ण से संबंधित कार्यों में पूर्ण रूप से तल्लीन रहता है। आत्मा का अस्तित्व चेतना से पहचाना जाता है, और व्यक्ति को अपनी चेतना में भौतिकता को हटाकर आध्यात्मिकता, या दूसरे शब्दों में, कृष्ण भावना को स्थापित करना चाहिए। वह जो आध्यात्मिक है, वह अनश्वर है, और वह जो भौतिक है, वह अस्थायी है। कृष्ण भावना के बिना, व्यक्ति की चेतना सदैव अस्थायी वस्तुओं में तल्लीन रहती है। इसलिए, सभी के लिए, कृष्ण ने भगवद् गीता (9.34) में सिफारिश की है, मन्मना भव मदभक्तो मदयाजी माम नमस्कुरु। व्यक्ति को सदैव कृष्ण के विचारों में तल्लीन रहना चाहिए, उसका भक्त बनना चाहिए, सदैव उसकी सेवा में संलग्न रहना चाहिए और सर्वोच्च महान के रूप में उसकी पूजा करनी चाहिए, और व्यक्ति को हमेशा उसे प्रणाम करना चाहिए। भौतिक जगत में, व्यक्ति सदैव किसी बड़े व्यक्ति का सेवक रहता है, और आध्यात्मिक जगत में, हमारी संवैधानिक स्थिति सर्वोच्च, परब्रह्म की सेवा करने की है। यह श्री चैतन्य महाप्रभु का उपदेश है। जीवेर 'स्वरूप' हय-कृष्णेर 'नित्यदासे' (चैतन्य चरितामृत मध्य 20.108)।
कृष्ण भावना में कार्य करना जीवन की पूर्णता है और योग की सर्वोच्च पूर्णता है। भगवान कृष्ण ने भगवद् गीता (6.47) में कहा है:
योगिनां अपि सर्वेषाम्
मद्गतेनांतरात्मना
श्रद्धावान् भजते यो माम
स मे युक्ततमो मतः
"सभी योगियों में से, जो सदैव मुझमें महान आस्था के साथ स्थित रहता है, मुझे पारलौकिक प्रेममय भक्ति में पूजता है, वह मेरे साथ योग में सबसे गहराई से जुड़ा हुआ है और सर्वोच्च योगी है।"
मृत्यु के समय आत्मा के दूसरे भौतिक शरीर में संक्रमण के लिए मन की स्थिति बहुत महत्वपूर्ण होती है, जो संकल्प और विकल्प के बीच झिलमिलाता रहता है, कुछ को स्वीकार करता और कुछ को अस्वीकार करता है।
यय यम् वापि स्मरन भावं
त्यजत्यंते कलेवरम्
तं तम एति कौन्तेय
सदा तद्भावभावितः
"मृत्यु के समय व्यक्ति जिस भी भावना में होता है, निश्चित रूप से मृत्यु के बाद उसे प्राप्त करता है।" (गीता 8.6) इसलिए व्यक्ति को महाराज अंबरीष की तरह भक्ति योग की व्यवस्था में अपने मन को प्रशिक्षित करना चाहिए, जो हमेशा कृष्ण भावना में रहते थे। स वै मनः कृष्ण पदावरविंदयोः। व्यक्ति को चौबीसों घंटे कृष्ण के चरण कमलों में अपने मन को जोड़ना चाहिए। यदि मन कृष्ण के चरण कमलों में लगा हुआ है, तो अन्य इंद्रियों की गतिविधियाँ कृष्ण की सेवा में लगे रहेंगे। हृषीकेण हृषीकेश सेवनं भक्तिर उच्यते: शुद्ध इंद्रियों से इंद्रियों के स्वामी हृषीकेश की सेवा करना भक्ति कहलाती है। जो लोग लगातार भक्ति सेवा में संलग्न रहते हैं, वे प्रकृति के भौतिक गुणों से ऊपर, पारलौकिक अवस्था में स्थित होते हैं। जैसा कि कृष्ण ने भगवद् गीता (14.26) में कहा है:
मां च योऽव्यभिचारेण
भक्ति योगेन सेवते
स गुणान् समतीत्यैतान
ब्रह्मभूयाय कल्पते
"जो पूर्ण भक्ति सेवा में संलग्न है, जो किसी भी परिस्थिति में पतन नहीं करता है, वह तुरंत भौतिक प्रकृति के गुणों को पार कर जाता है और इस प्रकार ब्रह्म के स्तर पर आ जाता है।" व्यक्ति को वेदिक साहित्यों से सफलता के रहस्य को सीखना चाहिए, खासकर जब वेदिक ज्ञान की सर्वोच्चता भगवद् गीता में प्रस्तुत की जाती है।
क्योंकि मन अंततः भगवान कृष्ण जो परमपुरुष हैं उनके नियंत्रण में होता है, इसलिए "अपस्मृति" शब्द का महत्वपूर्ण अर्थ है| अपने अस्तित्व को भूलना ही अपस्मृति है| भगवान इस अपस्मृति को नियंत्रित कर सकते हैं, जैसा कि भगवान कहते हैं, "मतः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनम् च:" "मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और विस्मरण की प्राप्ति होती है"| कृष्ण किसी को उसके वास्तविक पद को भूलने की बजाय, मरते समय उसकी मूल पहचान को पुनर्जीवित कर सकते हैं, भले ही उस वक़्त बुद्धि भटक रही हो| हालाँकि मृत्यु के समय बुद्धि अपूर्ण रूप से काम कर सकती है, कृष्ण अपने भक्त को अपने चरणो की शरण देते हैं| इसलिए जब कोई भक्त अपने शरीर को त्यागता है, तो उसका मन उसे दूसरे भौतिक शरीर में नहीं ले जाता (त्यागत्वा देहं पुनर्जन्म नैति, माम एति), इसकी बजाय, कृष्ण उसे उस स्थान पर ले जाते हैं जहाँ वो अपने लीलाओं में व्यस्त रहते हैं ( माम एति), जैसा कि हमने पिछले श्लोकों में चर्चा की थी| इसलिए, हमारी चेतना को हमेशा कृष्ण में ही अवशोषित रहना चाहिए, और तब ही हमारा जीवन सफल होगा| अन्यथा मन आत्मा को दूसरे भौतिक शरीर की ओर ले जाएगा| आत्मा को पिता के वीर्य में रखा जाएगा और माता के गर्भ में प्रवेश करा दिया जाएगा| वीर्य और अंडाणी पिता और माता के शरीर के स्वरूप के अनुसार एक विशेष प्रकार का शरीर बनाते हैं और जब शरीर परिपक्व हो जाता है, आत्मा उस शरीर में प्रवेश करती है और एक नया जीवन शुरू करती है| इसी तरह आत्मा एक शरीर से दूसरे शरीर में प्रवास करती रहती है (तथा देहान्तर-प्राप्तिः)| दुर्भाग्य से, मंदबुद्धि लोग सोचते हैं कि शरीर के खत्म होने पर सब खत्म हो जाता है| पूरी दुनिया ऐसे मूर्खों और दुष्टों के द्वारा गुमराह किया जा रहा है| लेकिन जैसे कि भगवत गीता (2.20) में कहा गया है कि , "न हन्यते हन्यामाने शरीरे"| शरीर के खत्म होने पर आत्मा नहीं मरती| बल्कि आत्मा दूसरे शरीर में प्रवेश करती है|
