श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 1: भगवान् श्रीकृष्ण का अवतार: परिचय  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  10.1.40 
व्रजंस्तिष्ठन् पदैकेन यथैवैकेन गच्छति ।
यथा तृणजलौकैवं देही कर्मगतिं गत: ॥ ४० ॥
 
 
अनुवाद
जिस तरह कोई व्यक्ति सड़क पर चलते हुए एक पैर जमीन पर टिकाता है और फिर दूसरे पैर को उठा लेता है, या जिस तरह सब्जी पर कोई कीड़ा, एक पत्ती से दूसरी पत्ती पर खुद को स्थानांतरित कर लेता है, उसी प्रकार बद्ध आत्मा एक शरीर छोड़कर दूसरे शरीर का आश्रय लेती है।
 
Just as a man while walking on the road puts one foot on the ground and then lifts the other foot, or just as a plant insect first sits on a leaf and then leaves it and goes to another leaf, similarly when a conditioned soul takes shelter of another body, he abandons the previous body.
तात्पर्य
यह आत्मा का एक शरीर से दुसरे शरीर में भ्रमण करने की प्रक्रिया है। मृत्यु के समय, उसकी मानसिक स्थिति के अनुसार, जीव सूक्ष्म शरीर, जिसमें मन बुद्धि और अहंकार होता है, द्वारा दूसरे स्थूल शरीर में ले जाया जाता है। जब उच्च अधिकारी यह निश्चय कर लेते हैं कि जीव का कौन सा स्थूल शरीर होगा, तो उसे ऐसे शरीर में प्रवेश करने को मजबूर किया जाता है, और इस प्रकार वह स्वतः ही अपना पिछला शरीर छोड़ देता है। मंद-बुद्धि व्यक्ति, जिनमें आत्मा के संक्रमण की प्रक्रिया को समझने के लिए बुद्धि नहीं है, यह मानते हैं कि जब स्थूल शरीर खत्म हो जाता है तो उसका जीवन हमेशा के लिए खत्म हो गया है। ऐसे लोगों के पास मस्तिष्क नहीं है जिससे वे आत्मा के संक्रमण की प्रक्रिया को समझ सके। वर्तमान समय में हरे कृष्ण आंदोलन का बहुत विरोध हो रहा है, जिसे ‘दिमाग धोने वाला’ आंदोलन कहा जा रहा है। पर वास्तव में तथाकथित वैज्ञानिक, दार्शनिक और अन्य पश्चिमी देशों के नेता बिल्कुल भी दिमागदार नहीं हैं। हरे कृष्ण आंदोलन ऐसे मूर्ख व्यक्तियों को उनके दिमाग को ज्ञान से रोशन करके उन्हें ऊपर उठाने का प्रयास कर रहा है ताकि वे मानव शरीर का लाभ उठा सकें। दुर्भाग्यवश, अज्ञानता के कारण, वे हरे कृष्ण आंदोलन को दिमाग धोने वाला आंदोलन मानते हैं। वे यह नहीं जानते कि ईश्वरीय चेतना के बिना कोई भी आत्मा को एक शरीर से दूसरे शरीर में भ्रमित करने को मजबूर किया जाता है। उनके शैतानी मस्तिष्क के कारण, उन्हें अगले जन्म में घृणित जीवन स्वीकार करने के लिए मजबूर किया जाएगा और व्यावहारिक रूप से वे कभी भी भौतिक अस्तित्व के सशर्त जीवन से मुक्त नहीं हो पाएँगे। इस श्लोक में यह बहुत स्पष्ट रूप से समझाया गया है कि आत्मा का यह संक्रमण कैसे घटित होता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)