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श्लोक 1.8.52  |
यथा पङ्केन पङ्काम्भ: सुरया वा सुराकृतम् ।
भूतहत्यां तथैवैकां न यज्ञैर्मार्ष्टुमर्हति ॥ ५२ ॥ |
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| अनुवाद |
| जैसे किसी कीचड़ भरे पानी को कीचड़ से ही छानना संभव नहीं है और जैसे मदिरा से सने हुए बर्तन को उसी मदिरा से साफ करना संभव नहीं, वैसे ही मनुष्यों का विनाश पशुओं की बलि देकर समाप्त नहीं किया जा सकता। |
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| जैसे किसी कीचड़ भरे पानी को कीचड़ से ही छानना संभव नहीं है और जैसे मदिरा से सने हुए बर्तन को उसी मदिरा से साफ करना संभव नहीं, वैसे ही मनुष्यों का विनाश पशुओं की बलि देकर समाप्त नहीं किया जा सकता। |
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| इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध एक के अंतर्गत आठवाँ अध्याय समाप्त होता है । |
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