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श्लोक 1.8.51  |
स्त्रीणां मद्धतबन्धूनां द्रोहो योऽसाविहोत्थित: ।
कर्मभिर्गृहमेधीयैर्नाहं कल्पो व्यपोहितुम् ॥ ५१ ॥ |
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| अनुवाद |
| मैंने बहुत सारी महिलाओं के दोस्तों और रिश्तेदारों को मरवा दिया है और इस तरह से मैंने इतनी दुश्मनी मोल ले ली है कि इसे अच्छे कामों या भौतिक कल्याण-कार्य के ज़रिए भी नहीं मिटाया जा सकता। |
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| मैंने बहुत सारी महिलाओं के दोस्तों और रिश्तेदारों को मरवा दिया है और इस तरह से मैंने इतनी दुश्मनी मोल ले ली है कि इसे अच्छे कामों या भौतिक कल्याण-कार्य के ज़रिए भी नहीं मिटाया जा सकता। |
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