श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 8: महारानी कुन्ती द्वारा प्रार्थना तथा परीक्षित की रक्षा  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  1.8.47 
आह राजा धर्मसुतश्चिन्तयन् सुहृदां वधम् ।
प्राकृतेनात्मना विप्रा: स्‍नेहमोहवशं गत: ॥ ४७ ॥
 
 
अनुवाद
धर्मराज युधिष्ठिर अपने मित्रों की मौत से दुखी हो गए थे और एक साधारण, भौतिकवादी इंसान की तरह ही दुखी थे। हे ऋषियों, स्नेह में डूबकर वह इस प्रकार बोले।
 
धर्मराज युधिष्ठिर अपने मित्रों की मौत से दुखी हो गए थे और एक साधारण, भौतिकवादी इंसान की तरह ही दुखी थे। हे ऋषियों, स्नेह में डूबकर वह इस प्रकार बोले।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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