श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 8: महारानी कुन्ती द्वारा प्रार्थना तथा परीक्षित की रक्षा  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  1.8.44 
सूत उवाच
पृथयेत्थं कलपदै: परिणूताखिलोदय: ।
मन्दं जहास वैकुण्ठो मोहयन्निव मायया ॥ ४४ ॥
 
 
अनुवाद
सूत गोस्वामी ने कहा: भगवान ने कुन्तीदेवी की प्रार्थना को सुना, जो उनकी महिमा के लिए चुने हुए शब्दों में रची गई थी। भगवान ने धीरे-धीरे मुस्कुराया। उनकी मुस्कान उतनी ही मनमोहक थी जितनी उनकी योगशक्ति।
 
सूत गोस्वामी ने कहा: भगवान ने कुन्तीदेवी की प्रार्थना को सुना, जो उनकी महिमा के लिए चुने हुए शब्दों में रची गई थी। भगवान ने धीरे-धीरे मुस्कुराया। उनकी मुस्कान उतनी ही मनमोहक थी जितनी उनकी योगशक्ति।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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