श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 8: महारानी कुन्ती द्वारा प्रार्थना तथा परीक्षित की रक्षा  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  1.8.41 
अथ विश्वेश विश्वात्मन् विश्वमूर्ते स्वकेषु मे ।
स्‍नेहपाशमिमं छिन्धि द‍ृढं पाण्डुषु वृष्णिषु ॥ ४१ ॥
 
 
अनुवाद
इसलिए हे ब्रह्मांड के स्वामी, हे ब्रह्मांड की आत्मा, हे विश्व-रूप, कृपया मेरे अपने लोगों, पाण्डवों और यादवों के प्रति मेरा स्नेह-बंधन तोड़ दें।
 
इसलिए हे ब्रह्मांड के स्वामी, हे ब्रह्मांड की आत्मा, हे विश्व-रूप, कृपया मेरे अपने लोगों, पाण्डवों और यादवों के प्रति मेरा स्नेह-बंधन तोड़ दें।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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