श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 8: महारानी कुन्ती द्वारा प्रार्थना तथा परीक्षित की रक्षा  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  1.8.40 
इमे जनपदा: स्वृद्धा: सुपक्‍वौषधिवीरुध: ।
वनाद्रिनद्युदन्वन्तो ह्येधन्ते तव वीक्षितै: ॥ ४० ॥
 
 
अनुवाद
ये सारे नगर और गाँव हर तरह से समृद्ध हो रहे हैं, क्योंकि जड़ी-बूटियों और अनाज की बहुतायत है, पेड़ फलों से लदे हुए हैं, नदियाँ बह रही हैं, पहाड़ खनिजों से और समुद्र धन-संपदा से भरे पड़े हैं। और यह सब आपकी कृपा-दृष्टि से ही हुआ है।
 
ये सारे नगर और गाँव हर तरह से समृद्ध हो रहे हैं, क्योंकि जड़ी-बूटियों और अनाज की बहुतायत है, पेड़ फलों से लदे हुए हैं, नदियाँ बह रही हैं, पहाड़ खनिजों से और समुद्र धन-संपदा से भरे पड़े हैं। और यह सब आपकी कृपा-दृष्टि से ही हुआ है।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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