श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 8: महारानी कुन्ती द्वारा प्रार्थना तथा परीक्षित की रक्षा  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  1.8.30 
जन्म कर्म च विश्वात्मन्नजस्याकर्तुरात्मन: ।
तिर्यङ्‍नृषिषु याद:सु तदत्यन्तविडम्बनम् ॥ ३० ॥
 
 
अनुवाद
हे विश्वात्मन! निश्चय ही यह विस्मित करने वाली बात है कि आप निष्क्रिय होते हुए भी कर्म करते हैं। आप प्राणशक्ति स्वरूप हैं, फिर भी जन्म लेते हैं। आप स्वयं पशुओं, मनुष्यों, ऋषियों और जलचरों के मध्य अवतरित होते हैं। वास्तव में यह चकित करने वाली बात है।
 
हे विश्वात्मन! निश्चय ही यह विस्मित करने वाली बात है कि आप निष्क्रिय होते हुए भी कर्म करते हैं। आप प्राणशक्ति स्वरूप हैं, फिर भी जन्म लेते हैं। आप स्वयं पशुओं, मनुष्यों, ऋषियों और जलचरों के मध्य अवतरित होते हैं। वास्तव में यह चकित करने वाली बात है।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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