श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 8: महारानी कुन्ती द्वारा प्रार्थना तथा परीक्षित की रक्षा  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  1.8.25 
विपद: सन्तु ता: शश्वत्तत्र तत्र जगद्गुरो ।
भवतो दर्शनं यत्स्यादपुनर्भवदर्शनम् ॥ २५ ॥
 
 
अनुवाद
मैं चाहती हूँ कि ये सारी विपत्तियाँ बार-बार आती रहें, जिससे हम आपका बार-बार दर्शन कर सकें, क्योंकि आपके दर्शन का मतलब है कि हमें बार-बार जन्म और मृत्यु न सहनी पड़ेगी।
 
मैं चाहती हूँ कि ये सारी विपत्तियाँ बार-बार आती रहें, जिससे हम आपका बार-बार दर्शन कर सकें, क्योंकि आपके दर्शन का मतलब है कि हमें बार-बार जन्म और मृत्यु न सहनी पड़ेगी।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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