श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 8: महारानी कुन्ती द्वारा प्रार्थना तथा परीक्षित की रक्षा  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  1.8.24 
विषान्महाग्ने: पुरुषाददर्शना-
दसत्सभाया वनवासकृच्छ्रत: ।
मृधे मृधेऽनेकमहारथास्त्रतो
द्रौण्यस्त्रतश्चास्म हरेऽभिरक्षिता: ॥ २४ ॥
 
 
अनुवाद
हे कृष्ण, आपने हमारे ऊपर विषाक्त खीर से, भीषण अग्नि-कांड से, मानव-भक्षीओं से, दुष्ट सभा से, वनवास-काल में हुए कष्टों से और महारथियों द्वारा लड़े गए युद्ध से हमारी रक्षा की थी। और अब आपने हमें अश्वत्थामा के अस्त्र से भी बचा लिया है।
 
हे कृष्ण, आपने हमारे ऊपर विषाक्त खीर से, भीषण अग्नि-कांड से, मानव-भक्षीओं से, दुष्ट सभा से, वनवास-काल में हुए कष्टों से और महारथियों द्वारा लड़े गए युद्ध से हमारी रक्षा की थी। और अब आपने हमें अश्वत्थामा के अस्त्र से भी बचा लिया है।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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