श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 8: महारानी कुन्ती द्वारा प्रार्थना तथा परीक्षित की रक्षा  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  1.8.23 
यथा हृषीकेश खलेन देवकी
कंसेन रुद्धातिचिरं शुचार्पिता ।
विमोचिताहं च सहात्मजा विभो
त्वयैव नाथेन मुहुर्विपद्गणात् ॥ २३ ॥
 
 
अनुवाद
हे हृषीकेश, इंद्रियों के स्वामी तथा देवों के देव, आपने लंबे समय तक बंदीगृह में कष्ट पा रही और दुष्ट राजा कंस द्वारा सताई जा रही अपनी माँ देवकी को, और निरंतर विपत्तियों से घिरे हुए मेरे और मेरे पुत्रों को मुक्त किया है।
 
हे हृषीकेश, इंद्रियों के स्वामी तथा देवों के देव, आपने लंबे समय तक बंदीगृह में कष्ट पा रही और दुष्ट राजा कंस द्वारा सताई जा रही अपनी माँ देवकी को, और निरंतर विपत्तियों से घिरे हुए मेरे और मेरे पुत्रों को मुक्त किया है।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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