श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 8: महारानी कुन्ती द्वारा प्रार्थना तथा परीक्षित की रक्षा  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  1.8.19 
मायाजवनिकाच्छन्नमज्ञाधोक्षजमव्ययम् ।
न लक्ष्यसे मूढद‍ृशा नटो नाट्यधरो यथा ॥ १९ ॥
 
 
अनुवाद
सीमित इंद्रिय-ज्ञान से परे होने के कारण, आप सदैव शुद्ध और पूर्ण रहने वाले तत्त्व हैं, जो भ्रामक शक्ति (माया) के पर्दे से ढके हुए हैं। आप मूर्ख दर्शक के लिए उसी तरह अदृश्य रहते हैं, जैसे अभिनेता के वेश में सजा हुआ कलाकार पहचान में नहीं आता है।
 
सीमित इंद्रिय-ज्ञान से परे होने के कारण, आप सदैव शुद्ध और पूर्ण रहने वाले तत्त्व हैं, जो भ्रामक शक्ति (माया) के पर्दे से ढके हुए हैं। आप मूर्ख दर्शक के लिए उसी तरह अदृश्य रहते हैं, जैसे अभिनेता के वेश में सजा हुआ कलाकार पहचान में नहीं आता है।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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