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श्लोक 1.6.37  |
सूत उवाच
एवं सम्भाष्य भगवान्नारदो वासवीसुतम् ।
आमन्त्र्य वीणां रणयन् ययौ यादृच्छिको मुनि: ॥ ३७ ॥ |
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| अनुवाद |
| सूत गोस्वामी ने कहा: नारद मुनि ने इस प्रकार व्यासदेव से कहा और उनसे विदा ली। फिर वे अपनी वीणा बजाते हुए अपनी इच्छानुसार विचरण करने के लिए चले गए। |
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| सूत गोस्वामी ने कहा: नारद मुनि ने इस प्रकार व्यासदेव से कहा और उनसे विदा ली। फिर वे अपनी वीणा बजाते हुए अपनी इच्छानुसार विचरण करने के लिए चले गए। |
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