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श्लोक 1.6.35  |
यमादिभिर्योगपथै: कामलोभहतो मुहु: ।
मुकुन्दसेवया यद्वत्तथात्माद्धा न शाम्यति ॥ ३५ ॥ |
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| अनुवाद |
| यह सच है कि योगाभ्यास द्वारा इंद्रियों को नियंत्रण में करके काम-वासनाओं से मुक्ति मिल सकती है। लेकिन फिर भी आत्मा को संतुष्टि नहीं मिलती क्योंकि वो संतुष्टि तो भगवान की भक्ति करने से ही मिलती है। |
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| यह सच है कि योगाभ्यास द्वारा इंद्रियों को नियंत्रण में करके काम-वासनाओं से मुक्ति मिल सकती है। लेकिन फिर भी आत्मा को संतुष्टि नहीं मिलती क्योंकि वो संतुष्टि तो भगवान की भक्ति करने से ही मिलती है। |
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