श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 6: नारद तथा व्यासदेव का संवाद  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  1.6.34 
एतद्ध्यातुरचित्तानां मात्रास्पर्शेच्छया मुहु: ।
भवसिन्धुप्लवो द‍ृष्टो हरिचर्यानुवर्णनम् ॥ ३४ ॥
 
 
अनुवाद
यह मेरा निजी अनुभव है कि जो लोग विषय-वस्तुओं से सम्पर्क की इच्छा के कारण सदैव चिंताग्रस्त रहते हैं, वे भगवान के दिव्य कार्यों के निरंतर जप के रूप में सबसे उपयुक्त नाव पर चढ़कर अज्ञानता के सागर को पार कर सकते हैं।
 
यह मेरा निजी अनुभव है कि जो लोग विषय-वस्तुओं से सम्पर्क की इच्छा के कारण सदैव चिंताग्रस्त रहते हैं, वे भगवान के दिव्य कार्यों के निरंतर जप के रूप में सबसे उपयुक्त नाव पर चढ़कर अज्ञानता के सागर को पार कर सकते हैं।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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