श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 6: नारद तथा व्यासदेव का संवाद  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  1.6.33 
प्रगायत: स्ववीर्याणि तीर्थपाद: प्रियश्रवा: ।
आहूत इव मे शीघ्रं दर्शनं याति चेतसि ॥ ३३ ॥
 
 
अनुवाद
ज्यों ही मैं भगवान श्रीकृष्ण की सुमधुर महिमा वाली पवित्र लीलाओं का कीर्तन करना शुरु करता हूँ, वैसे ही वे मेरे हृदय में तत्क्षण प्रकट हो जाते हैं, मानो उन्हें बुलाया गया हो।
 
ज्यों ही मैं भगवान श्रीकृष्ण की सुमधुर महिमा वाली पवित्र लीलाओं का कीर्तन करना शुरु करता हूँ, वैसे ही वे मेरे हृदय में तत्क्षण प्रकट हो जाते हैं, मानो उन्हें बुलाया गया हो।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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