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श्लोक 1.6.26  |
नामान्यनन्तस्य हतत्रप: पठन्
गुह्यानि भद्राणि कृतानि च स्मरन् ।
गां पर्यटंस्तुष्टमना गतस्पृह:
कालं प्रतीक्षन् विमदो विमत्सर: ॥ २६ ॥ |
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| अनुवाद |
| मैंने औपचारिकताओं को त्याग कर भगवान के पवित्र नाम और महिमा का बार-बार जाप करना शुरू कर दिया। भगवान की दिव्य लीलाओं का कीर्तन एवं स्मरण बहुत शुभ परिणामदायक है। ऐसा करते हुए मैंने पृथ्वी पर बहुत समय बिताया, पूरी तरह से संतुष्ट, विनम्र और ईर्ष्या से रहित। |
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| मैंने औपचारिकताओं को त्याग कर भगवान के पवित्र नाम और महिमा का बार-बार जाप करना शुरू कर दिया। भगवान की दिव्य लीलाओं का कीर्तन एवं स्मरण बहुत शुभ परिणामदायक है। ऐसा करते हुए मैंने पृथ्वी पर बहुत समय बिताया, पूरी तरह से संतुष्ट, विनम्र और ईर्ष्या से रहित। |
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