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श्लोक 1.6.24  |
मतिर्मयि निबद्धेयं न विपद्येत कर्हिचित् ।
प्रजासर्गनिरोधेऽपि स्मृतिश्च मदनुग्रहात् ॥ २४ ॥ |
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| अनुवाद |
| मेरी भक्ति में लगी बुद्धि को किसी भी समय कोई बाधा नहीं पहुँचा सकता। यहाँ तक कि सृष्टि के समय और संहार के समय भी तुम्हारी याद मेरे अनुग्रह से बनी रहेगी। |
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| मेरी भक्ति में लगी बुद्धि को किसी भी समय कोई बाधा नहीं पहुँचा सकता। यहाँ तक कि सृष्टि के समय और संहार के समय भी तुम्हारी याद मेरे अनुग्रह से बनी रहेगी। |
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