श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 6: नारद तथा व्यासदेव का संवाद  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  1.6.22 
सकृद् यद्दर्शितं रूपमेतत्कामाय तेऽनघ ।
मत्काम: शनकै: साधु सर्वान्मुञ्चति हृच्छयान् ॥ २२ ॥
 
 
अनुवाद
हे निष्पाप पुरुष, तुमने मुझे एक ही बार देखा है और यह तुम्हारी इच्छा को मेरे प्रति और प्रबल बनाने के लिए है क्योंकि जितना अधिक तुम मेरे लिए लालायित होगे, उतना ही अधिक तुम भौतिक इच्छाओं से मुक्त हो सकोगे।
 
हे निष्पाप पुरुष, तुमने मुझे एक ही बार देखा है और यह तुम्हारी इच्छा को मेरे प्रति और प्रबल बनाने के लिए है क्योंकि जितना अधिक तुम मेरे लिए लालायित होगे, उतना ही अधिक तुम भौतिक इच्छाओं से मुक्त हो सकोगे।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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