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श्लोक 1.6.20  |
एवं यतन्तं विजने मामाहागोचरो गिराम् ।
गम्भीरश्लक्ष्णया वाचा शुच: प्रशमयन्निव ॥ २० ॥ |
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| अनुवाद |
| उस एकांत स्थान में मेरे प्रयासों को देखकर लौकिक वर्णन से परे भगवान् ने मेरे दुःख को हल्का करने के लिए गंभीर और सुखद वाणी में मुझसे कहा। |
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| उस एकांत स्थान में मेरे प्रयासों को देखकर लौकिक वर्णन से परे भगवान् ने मेरे दुःख को हल्का करने के लिए गंभीर और सुखद वाणी में मुझसे कहा। |
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