| श्रीमद् भागवतम » स्कन्ध 1: सृष्टि » अध्याय 6: नारद तथा व्यासदेव का संवाद » श्लोक 18 |
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| | | | श्लोक 1.6.18  | रूपं भगवतो यत्तन्मन:कान्तं शुचापहम् ।
अपश्यन् सहसोत्तस्थे वैक्लव्याद्दुर्मना इव ॥ १८ ॥ | | | | | | अनुवाद | | भगवान का परम तेजस्वी रूप, जिस प्रकार है, वह मन की इच्छा को संतुष्ट करता है और सभी मानसिक विसंगतियों को तुरंत मिटा देता है। उस रूप के लुप्त हो जाने पर मैं परेशान होकर उठ खड़ा हुआ, जैसा की प्रायः किसी वांछित वस्तु के खो जाने पर होता है। | | | | भगवान का परम तेजस्वी रूप, जिस प्रकार है, वह मन की इच्छा को संतुष्ट करता है और सभी मानसिक विसंगतियों को तुरंत मिटा देता है। उस रूप के लुप्त हो जाने पर मैं परेशान होकर उठ खड़ा हुआ, जैसा की प्रायः किसी वांछित वस्तु के खो जाने पर होता है। | | ✨ ai-generated | | |
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