| श्रीमद् भागवतम » स्कन्ध 1: सृष्टि » अध्याय 6: नारद तथा व्यासदेव का संवाद » श्लोक 13 |
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| | | | श्लोक 1.6.13  | नलवेणुशरस्तन्बकुशकीचकगह्वरम् ।
एक एवातियातोऽहमद्राक्षं विपिनं महत् ।
घोरं प्रतिभयाकारं व्यालोलूकशिवाजिरम् ॥ १३ ॥ | | | | | | अनुवाद | | तब मैं अकेले ही अनेक जंगलों से होकर निकल गया, जो नरकटों, बाँसों, सरपतों, कुशों, अपतृणों और गह्वरों से भरे हुए थे और जिनसे अकेले निकल पाना बहुत कठिन था। मैंने बहुत ही घने, अंधकारमय और अत्यधिक भयानक जंगलों को देखा, जो सर्पों, उल्लुओं और सियारों की क्रीड़ास्थली बने हुए थे। | | | | तब मैं अकेले ही अनेक जंगलों से होकर निकल गया, जो नरकटों, बाँसों, सरपतों, कुशों, अपतृणों और गह्वरों से भरे हुए थे और जिनसे अकेले निकल पाना बहुत कठिन था। मैंने बहुत ही घने, अंधकारमय और अत्यधिक भयानक जंगलों को देखा, जो सर्पों, उल्लुओं और सियारों की क्रीड़ास्थली बने हुए थे। | | ✨ ai-generated | | |
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