श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 6: नारद तथा व्यासदेव का संवाद  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  1.6.10 
तदा तदहमीशस्य भक्तानां शमभीप्सत: ।
अनुग्रहं मन्यमान: प्रातिष्ठं दिशमुत्तराम् ॥ १० ॥
 
 
अनुवाद
मैंने इसे प्रभु की उस विशेष कृपा के रूप में स्वीकार किया, जो सदा अपने भक्तों का हित चाहते हैं, और इस प्रकार सोचकर मैं उत्तर की ओर चल पड़ा।
 
मैंने इसे प्रभु की उस विशेष कृपा के रूप में स्वीकार किया, जो सदा अपने भक्तों का हित चाहते हैं, और इस प्रकार सोचकर मैं उत्तर की ओर चल पड़ा।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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