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श्लोक 1.4.19  |
चातुर्होत्रं कर्म शुद्धं प्रजानां वीक्ष्य वैदिकम् ।
व्यदधाद्यज्ञसन्तत्यै वेदमेकं चतुर्विधम् ॥ १९ ॥ |
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| अनुवाद |
| उन्होंने देखा कि वेदों में वर्णित यज्ञ वे माध्यम है जिनके जरिये लोगों के काम-धंधों को पवित्र किया जा सकता है। अतः इस विधि को आसान बनाने के लिए ही उन्होंने एक ही वेद के चार भाग कर दिए जिससे वो लोगों के बीच फैल सकें। |
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| उन्होंने देखा कि वेदों में वर्णित यज्ञ वे माध्यम है जिनके जरिये लोगों के काम-धंधों को पवित्र किया जा सकता है। अतः इस विधि को आसान बनाने के लिए ही उन्होंने एक ही वेद के चार भाग कर दिए जिससे वो लोगों के बीच फैल सकें। |
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