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श्लोक 1.4.16  |
परावरज्ञ: स ऋषि: कालेनाव्यक्तरंहसा ।
युगधर्मव्यतिकरं प्राप्तं भुवि युगे युगे ॥ १६ ॥ |
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| अनुवाद |
| युगों के कर्तव्यों में विसंगतियों को महर्षि व्यासदेव ने देखा। काल के अदृश्य प्रभाव के कारण विभिन्न युगों में पृथ्वी पर यह होता रहता है। |
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| युगों के कर्तव्यों में विसंगतियों को महर्षि व्यासदेव ने देखा। काल के अदृश्य प्रभाव के कारण विभिन्न युगों में पृथ्वी पर यह होता रहता है। |
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