श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 2: दिव्यता तथा दिव्य सेवा  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  1.2.5 
मुनय: साधु पृष्टोऽहं भवद्भ‍िर्लोकमङ्गलम् ।
यत्कृत: कृष्णसम्प्रश्नो येनात्मा सुप्रसीदति ॥ ५ ॥
 
 
अनुवाद
हे मुनियो, आपने मुझसे उचित प्रश्न पूछे हैं। आपके प्रश्न प्रशंसनीय हैं, क्योंकि वे भगवान कृष्ण से संबंधित हैं और इसलिए विश्व कल्याण के लिए हैं। इस प्रकार के प्रश्नों से ही पूर्ण आत्म संतुष्टि संभव है।
 
O sages, you have asked me the right question. Your questions are praiseworthy, because they are related to Lord Krishna and thus are for the welfare of the world. Only such questions can lead to complete self-satisfaction.
तात्पर्य
जैसा कि यहाँ पहले ही बताया गया है कि भागवत में पूर्ण सत्य को जाना जाता है, नैमिषारण्य के ऋषियों के प्रश्न उचित और न्यायसंगत हैं, क्योंकि वे कृष्ण से संबंधित हैं, जो ईश्वर के सर्वोच्च व्यक्तित्व, पूर्ण सत्य हैं। भगवद-गीता (15.15) में भगवान का व्यक्तित्व कहता है कि सभी वेदों में उनके, भगवान कृष्ण को खोजने के लिए आग्रह के अलावा और कुछ नहीं है। इस प्रकार, कृष्ण से संबंधित प्रश्न सभी वैदिक पूछताछ का सार और तत्व हैं। पूरी दुनिया सवालों और जवाबों से भरी हुई है। पक्षी, जानवर और आदमी सभी सतत सवालों और जवाबों के मामले में व्यस्त हैं। सुबह घोंसले में पक्षी सवालों और जवाबों में व्यस्त हो जाते हैं, और शाम को भी वही पक्षी वापस आते हैं और फिर से सवालों और जवाबों में व्यस्त हो जाते हैं। मनुष्य, जब तक वह रात में गहरी नींद में नहीं होता है, प्रश्न और उत्तर में व्यस्त रहता है। बाजार में व्यापारी प्रश्न और उत्तर में व्यस्त हैं, और इसी तरह अदालत में वकील और स्कूलों और कॉलेजों में छात्र। संसद में विधायक भी प्रश्नोत्तर में व्यस्त रहते हैं और राजनेता और प्रेस प्रतिनिधि सभी प्रश्नोत्तर में व्यस्त रहते हैं। यद्यपि वे अपने पूरे जीवन में ऐसे ही प्रश्न और उत्तर करते रहते हैं, पर वे बिल्कुल भी संतुष्ट नहीं होते। आत्मा की संतुष्टि केवल कृष्ण के विषय पर प्रश्नों और उत्तरों से प्राप्त की जा सकती है। कृष्ण हमारे सबसे अंतरंग गुरु, मित्र, पिता या पुत्र और दांपत्य प्रेम की वस्तु हैं। कृष्ण को भूलकर, हमने प्रश्न और उत्तर के कई उद्देश्य बनाए हैं, लेकिन उनमें से कोई भी हमें पूर्ण संतुष्टि देने में सक्षम नहीं है। सभी चीजें - कृष्ण के अलावा - केवल अस्थायी संतुष्टि देती हैं, इसलिए यदि हमें पूर्ण संतुष्टि लेनी है तो हमें कृष्ण के बारे में सवालों और जवाबों के बारे में लेना चाहिए। हम एक पल भी बिना प्रश्न किए या उत्तर दिए बिना नहीं रह सकते। क्योंकि श्रीमद्-भागवत कृष्ण से संबंधित प्रश्नों और उत्तरों से संबंधित है, हम केवल इस पारलौकिक साहित्य को पढ़ने और सुनने से ही सर्वोच्च संतुष्टि प्राप्त कर सकते हैं। सामाजिक, राजनीतिक या धार्मिक मामलों से संबंधित सभी समस्याओं का एक संपूर्ण समाधान के लिए श्रीमद्-भागवत को सीखना चाहिए। श्रीमद्भागवत और कृष्ण सभी चीजों का योग हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)