विजय के मार्ग प्रदर्शक श्रीमद्भागवत का पाठ करने से पहले, मानव को भगवान नारायण, सर्वोत्तम नरनारायण ऋषि, ज्ञान की देवी माता सरस्वती और ग्रंथ के रचयिता श्रील व्यासदेव को नमन करना चाहिए।
Before reciting (listening to) this Shrimad Bhagwat as a means of victory, one should pay obeisance to Shri Lord Narayan, Narottam Naranarayan Rishi, Mother Saraswati, the goddess of knowledge and the author Srila Vyasdev.
तात्पर्य
सभी वैदिक साहित्य और पुराण भौतिक अस्तित्व के सबसे अंधकारमय क्षेत्र को जीतने के लिए हैं। जीव भगवान के साथ अपने संबंध को भूलने की स्थिति में है क्योंकि वह अनादिकाल से भौतिक संवेदनात्मक संतुष्टि के प्रति अति आकर्षित है। भौतिक दुनिया में उसका अस्तित्व के लिए संघर्ष स्थायी है, और योजनाएँ बनाकर उससे बाहर निकलना उसके लिए संभव नहीं है। यदि वह इस स्थायी अस्तित्व संघर्ष को जीतना चाहता है, तो उसे भगवान के साथ अपने शाश्वत संबंध को पुनः स्थापित करना होगा। और जो ऐसे उपचारात्मक उपायों को अपनाना चाहता है, उसे वेदों और पुराणों जैसे साहित्य का सहारा लेना चाहिए। मूर्ख लोग कहते हैं कि पुराणों का वेदों से कोई संबंध नहीं है। हालाँकि, पुराण विभिन्न प्रकार के पुरुषों के लिए अभिप्रेत वेदों की पूरक व्याख्याएँ हैं। सभी पुरुष समान नहीं हैं। कुछ पुरुष हैं जो सद्गुण के तरीके से संचालित होते हैं, अन्य जो कामभाव के अधीन हैं और अन्य जो अज्ञानता के अधीन हैं। पुराणों को इस प्रकार विभाजित किया गया है कि कोई भी वर्ग के व्यक्ति उनका लाभ उठा सकते हैं और धीरे-धीरे अपनी खोई हुई स्थिति को पुनः प्राप्त कर सकते हैं और अस्तित्व के लिए कठिन संघर्ष से बाहर निकल सकते हैं। श्रील सूत गोस्वामी पुराणों के पाठ का तरीका बताते हैं। वेदों और पुराणों के प्रचारक बनने की इच्छा रखने वाले व्यक्ति इसका पालन कर सकते हैं। श्रीमद्-भागवतम एक निर्मल पुराण है, और यह विशेष रूप से उनके लिए है जो भौतिक उलझनों से स्थायी रूप से बाहर निकलना चाहते हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥