तया विलसितेष्वेषु गुणेषु गुणवानिव ।
अन्त:प्रविष्ट आभाति विज्ञानेन विजृम्भित: ॥ ३१ ॥
अनुवाद
भौतिक पदार्थों की उत्पत्ति करने के बाद, भगवान (वासुदेव) अपने विस्तार से उनमें प्रवेश करते हैं। और यद्यपि वे प्रकृति के गुणों से घिरे हुए हैं और उत्पन्न किए गए प्राणियों में से एक जैसे दिखाई देते हैं, किन्तु वे अपनी दिव्य स्थिति में सदैव पूर्ण रूप से प्रबुद्ध रहते हैं।
After creating material matter, the Lord (Vāsudeva) expands Himself and enters it. Although He appears like one of the created living entities while residing in the modes of nature, He is always fully illuminated in His transcendental position.
तात्पर्य
सजीव इकाइयाँ प्रभु के पृथक अंग और अंश हैं, और शर्तों के अधीन रहने वाली सजीव इकाइयाँ, जो आध्यात्मिक राज्य के लिए अयोग्य है, पदार्थ का पूर्ण रूप से आनंद लेने के लिए भौतिक संसार में फैली हुई हैं। परमात्मा और सजीव संस्थाओं के सनातन मित्र के रूप में, प्रभु, अपने पूर्ण खंडों से एक, सजीव इकाइयों के साथ उनके भौतिक भोग में मार्गदर्शन करने और सभी गतिविधियों के साक्षी बनने के लिए जाते हैं। जबकि सजीव इकाइयाँ भौतिक स्थितियों का आनंद उठाती हैं, प्रभु भौतिक वातावरण से अप्रभावित होकर अपनी पारलौकिक स्थिति बनाए रखते हैं। वैदिक साहित्य (श्रुति) में कहा गया है कि एक पेड़ में दो पक्षी होते हैं।* उनमें से एक पेड़ का फल खा रहा है, जबकि दूसरा क्रियाओं को देख रहा है। साक्षी प्रभु हैं, और फल खाने वाला सजीव इकाई है। फल खाने वाला (सजीव इकाई) अपनी वास्तविक पहचान भूल गया है और भौतिक स्थितियों की फलदायी गतिविधियों में अभिभूत है, लेकिन प्रभु (परमात्मा) हमेशा पारलौकिक ज्ञान से भरे रहते हैं। यही अतिआत्मा और शर्तों के अधीन रहने वाली आत्मा के बीच का अंतर है। शर्तों के अधीन रहने वाली आत्मा, सजीव इकाई, प्रकृति के नियमों द्वारा नियंत्रित होती है, जबकि परमात्मा, या अतिआत्मा, भौतिक ऊर्जा की नियंत्रक है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥