आत्मा की गतिविधि पदार्थ के संपर्क में व्यभिचार हो जाती है, और इस तरह से रोगग्रस्त गतिविधियों को वासना, इच्छा, लालसा, निष्क्रियता, मूर्खता और नींद के रूप में व्यक्त किया जाता है। भक्ति सेवा का प्रभाव जुनून और अज्ञानता के इन प्रभावों को पूरी तरह से समाप्त करके प्रकट होता है। भक्त एक बार में अच्छाई के तरीके में तय हो जाता है, और वह वसुदेव की स्थिति, या बिना मिश्रित सत्व की स्थिति, या शुद्ध-सत्व की स्थिति तक उठने के लिए और प्रगति करता है। केवल इस शुद्ध-सत्व अवस्था में ही कोई भगवान के लिए शुद्ध स्नेह के बल पर कृष्ण को आमने-सामने देख सकता है।
एक भक्त हमेशा बिना मिश्रित अच्छाई के तरीके में होता है; इसलिए वह किसी को नुकसान नहीं पहुंचाता। लेकिन गैर-भक्त, वह चाहे कितना भी शिक्षित क्यों न हो, हमेशा हानिकारक होता है। एक भक्त न तो मूर्ख है और न ही भावुक। हानिकारक, मूर्ख और भावुक भगवान के भक्त नहीं हो सकते, हालाँकि वे बाहरी वेशभूषा से खुद को भक्त के रूप में प्रचारित कर सकते हैं। एक भक्त हमेशा भगवान के सभी अच्छे गुणों से योग्य होता है। मात्रात्मक रूप से ऐसे योग्यताएं भिन्न हो सकती हैं, लेकिन गुणात्मक रूप से भगवान और उनके भक्त दोनों एक और एक ही हैं।
