श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 2: दिव्यता तथा दिव्य सेवा  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  1.2.19 
तदा रजस्तमोभावा: कामलोभादयश्च ये ।
चेत एतैरनाविद्धं स्थितं सत्त्वे प्रसीदति ॥ १९ ॥
 
 
अनुवाद
जैसे ही हृदय में अडिग और प्रेममय भक्ति स्थापित हो जाती है, प्रकृति के काम, इच्छा और लोभ जैसे रजोगुण और तमोगुण के प्रभाव हृदय से गायब हो जाते हैं। तब भक्त सतोगुण में स्थिर होकर परम सुखी हो जाता है।
 
As soon as unwavering love and devotion is established in the heart, the effects of Rajoguna and Tamoguna of nature such as lust, desire and greed disappear from the heart. Then the devotee becomes extremely happy by being situated in Sattva Guna.
तात्पर्य
एक सजीव अपनी सामान्य सांविधानिक स्थित में आध्यात्मिक आनंद में पूर्ण रूप से संतुष्ट रहता है। अस्तित्व की इस अवस्था को ब्रह्म-भूत या आत्मानंद या आत्म-संतोष की अवस्था कहा जाता है। यह आत्म-संतोष निष्क्रिय मूर्ख की संतुष्टि जैसा नहीं होता। निष्क्रिय मूर्ख मूढ़ अज्ञानता की स्थिति में है, जबकि आत्म-संतुष्ट आत्मानंदी भौतिक अवस्था के अस्तित्व के लिए पारलौकिक है। पूर्णता के इस स्तर को प्राप्त होते ही वह एक अपरिवर्तनीय भक्ति सेवा में स्थिर होता है। भक्ति सेवा निष्क्रियता नहीं है, बल्कि आत्मा की निष्कलंक गतिविधि है।

आत्मा की गतिविधि पदार्थ के संपर्क में व्यभिचार हो जाती है, और इस तरह से रोगग्रस्त गतिविधियों को वासना, इच्छा, लालसा, निष्क्रियता, मूर्खता और नींद के रूप में व्यक्त किया जाता है। भक्ति सेवा का प्रभाव जुनून और अज्ञानता के इन प्रभावों को पूरी तरह से समाप्त करके प्रकट होता है। भक्त एक बार में अच्छाई के तरीके में तय हो जाता है, और वह वसुदेव की स्थिति, या बिना मिश्रित सत्व की स्थिति, या शुद्ध-सत्व की स्थिति तक उठने के लिए और प्रगति करता है। केवल इस शुद्ध-सत्व अवस्था में ही कोई भगवान के लिए शुद्ध स्नेह के बल पर कृष्ण को आमने-सामने देख सकता है।

एक भक्त हमेशा बिना मिश्रित अच्छाई के तरीके में होता है; इसलिए वह किसी को नुकसान नहीं पहुंचाता। लेकिन गैर-भक्त, वह चाहे कितना भी शिक्षित क्यों न हो, हमेशा हानिकारक होता है। एक भक्त न तो मूर्ख है और न ही भावुक। हानिकारक, मूर्ख और भावुक भगवान के भक्त नहीं हो सकते, हालाँकि वे बाहरी वेशभूषा से खुद को भक्त के रूप में प्रचारित कर सकते हैं। एक भक्त हमेशा भगवान के सभी अच्छे गुणों से योग्य होता है। मात्रात्मक रूप से ऐसे योग्यताएं भिन्न हो सकती हैं, लेकिन गुणात्मक रूप से भगवान और उनके भक्त दोनों एक और एक ही हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)