तस्मादेकेन मनसा भगवान् सात्वतां पति: ।
श्रोतव्य: कीर्तितव्यश्च ध्येय: पूज्यश्च नित्यदा ॥ १४ ॥
अनुवाद
अतः मनुष्य को अपना ध्यान केन्द्रित रख कर उन परम पुरुषोत्तम भगवान् की महिमा, कीर्तन, स्मरण और पूजा निरंतर करनी चाहिए, जो भक्तों के रक्षक हैं।
Therefore, one should concentrate one's mind and continuously listen to, chant, remember and worship the Supreme Personality of Godhead, who is the protector of the devotees.
तात्पर्य
यदि परम सत्य की प्राप्ति जीवन का परम लक्ष्य है, तो इसे हर तरीके से पूरा करना होगा। उपर्युक्त सभी जातियों और जीवन के आदेशों में, चार प्रक्रियाएँ, अर्थात् महिमामंडन, श्रवण, स्मरण और पूजा, सामान्य व्यवसाय हैं। जीवन के इन सिद्धांतों के बिना कोई भी अस्तित्व में नहीं रह सकता। जीवित प्राणी की गतिविधियों में जीवन के इन चार विभिन्न सिद्धांतों में व्यस्तता शामिल होती है। खासकर आधुनिक समाज में, सभी गतिविधियाँ कम या ज्यादा सुनने और महिमामंडन पर निर्भर हैं। किसी भी सामाजिक स्थिति का कोई भी व्यक्ति मानव समाज में बहुत ही कम समय में एक प्रसिद्ध व्यक्ति बन जाता है यदि उसे दैनिक समाचार पत्रों में सरलता से सही या गलत तरीके से महिमामंडित किया जाता है। कभी-कभी किसी विशेष पार्टी के राजनीतिक नेताओं को भी समाचार पत्र के प्रचार द्वारा विज्ञापित किया जाता है, और महिमामंडन की ऐसी विधि से एक तुच्छ व्यक्ति कुछ ही समय में एक महत्वपूर्ण व्यक्ति बन जाता है। लेकिन किसी अयोग्य व्यक्ति का झूठा महिमामंडन करने से ऐसा प्रचार उस विशेष व्यक्ति या समाज के लिए भी कोई भलाई नहीं ला सकता है। इस तरह के प्रचार पर कुछ अस्थायी प्रतिक्रियाएँ हो सकती हैं, लेकिन इसका कोई स्थायी प्रभाव नहीं होता है। इसलिए ऐसी गतिविधियाँ समय की बर्बादी हैं। महिमामंडन का वास्तविक उद्देश्य भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व है, जिसने हमारे सामने प्रकट होने वाली हर चीज बनाई है। हमने इस भागवतम के "जनमादि अस्य" श्लोक की शुरुआत से ही इस तथ्य पर विस्तार से चर्चा की है। दूसरों की महिमा करने या दूसरों को सुनने की प्रवृत्ति को महिमामंडन की वास्तविक वस्तु - सर्वोच्च सत्ता की ओर मोड़ा जाना चाहिए। और इससे खुशी मिलेगी।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥