जीवन की इच्छाओं को कभी भी इंद्रियों की संतुष्टि की ओर नहीं बढ़ाना चाहिए। मनुष्य को स्वस्थ जीवन या आत्म-संरक्षण की इच्छा ही रखनी चाहिए, क्योंकि मनुष्य परम सत्य के विषय में समझने के लिए बना है। मनुष्य के कार्यों का कोई अन्य लक्ष्य नहीं होना चाहिए।
The desires of life should not be aimed at sense gratification. Man should only wish for a healthy life or self-preservation, because man is created for the purpose of inquiring about the ultimate truth. Man's instincts should not have any other goal apart from this.
तात्पर्य
पूरी तरह से भ्रम हुई भौतिक सभ्यता गलत दिशा में जा रही है, संवेद सुखों की पूर्ति। ऐसी सभ्यता में, जीवन के सभी क्षेत्रों में, अंतिम लक्ष्य संवेद सुख प्राप्त करना होता है। राजनीति, समाज सेवा, परोपकार, लोकोपकार और अंततः धर्म या मोक्ष में भी, संवेद सुख का रंग ही अधिक दिखता है। राजनीति के क्षेत्र में, लोगो के नेता आपस में एक-दूसरे से लड़ते हैं, अपने व्यक्तिगत संवेद सुख को पूरा करने के लिए। मतदाता तथाकथित नेताओं की पूजा तभी तक करते हैं, जब तक वे संवेद सुख का वायदा करते हैं। जैसे ही मतदाता अपने संवेद सुखों से संतुष्ट नहीं होते, वे नेताओं को पद से हटा देते हैं। नेता हमेशा अपने अनुयायियों को यह कह कर निराश करते हैं कि वे उनके संवेद सुखों को पूरा नहीं कर सकते। किसी भी अन्य क्षेत्र में भी यही लागू होता है, कोई भी जीवन की समस्याओं के बारे में गंभीर नहीं है। यहां तक कि जो लोग मोक्ष के मार्ग पर हैं, वे भी परम सत्य के साथ एक होना चाहते हैं और संवेद सुख के लिए आध्यात्मिक आत्महत्या करना चाहते हैं। लेकिन भागवतम कहते हैं कि व्यक्ति को संवेद सुख के लिए नहीं जीना चाहिए। व्यक्ति को अपने संवेद सुखों को तभी तक ही पूरा करना चाहिए, जितना कि आत्मरक्षा के लिए आवश्यक है, न कि संवेद सुख के लिए। क्योंकि शरीर संवेदों से बना है, जिन्हें भी संतुष्टि के एक निश्चित स्तर की आवश्यकता होती है, ऐसे संवेद सुखों की संतुष्टि के लिए विनियामक निर्देश हैं। लेकिन संवेद सुख असीमित आनंद के लिए नहीं हैं। उदाहरण के लिए, संतान के लिए एक पुरुष और एक महिला का विवाह या संयोजन आवश्यक है, लेकिन यह संवेद सुख के लिए नहीं है। स्वैच्छिक संयम की अनुपस्थिति में, परिवार नियोजन के लिए प्रचार होता है, लेकिन मूर्ख लोग यह नहीं जानते कि परिवार नियोजन स्वचालित रूप से निष्पादित होता है जैसे ही परम सत्य की तलाश होती है। परम सत्य के साधकों को कभी भी संवेद सुखों में अनावश्यक व्यस्तता से आकर्षित नहीं किया जाता है क्योंकि परम सत्य की तलाश करने वाले गंभीर छात्र हमेशा सत्य का अनुसंधान करने के काम से अभिभूत होते हैं। इसलिए, जीवन के हर क्षेत्र में, अंतिम लक्ष्य परम सत्य की तलाश होनी चाहिए, और उस तरह की व्यस्तता व्यक्ति को खुश कर देगी क्योंकि वह संवेद सुखों की किस्मों में कम व्यस्त होगा। और वह परम सत्य क्या है, इसे इस प्रकार समझाया गया है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥