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श्लोक 1.19.6  |
या वै लसच्छ्रीतुलसीविमिश्र-
कृष्णाङ्घ्रिरेण्वभ्यधिकाम्बुनेत्री ।
पुनाति लोकानुभयत्र सेशान्
कस्तां न सेवेत मरिष्यमाण: ॥ ६ ॥ |
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| अनुवाद |
| यह नदी (गंगा) सबसे शुभ जल धारण करती है, जिसमें भगवान के चरणों की धूल और तुलसी के पत्ते मिले होते हैं। इसलिए यह जल तीनों लोकों को भीतर और बाहर से पवित्र करता है और भगवान शिव और अन्य देवताओं को भी पवित्र करता है। अत: जिसकी मृत्यु निश्चित है, उसे इस नदी की शरण लेनी चाहिए। |
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| यह नदी (गंगा) सबसे शुभ जल धारण करती है, जिसमें भगवान के चरणों की धूल और तुलसी के पत्ते मिले होते हैं। इसलिए यह जल तीनों लोकों को भीतर और बाहर से पवित्र करता है और भगवान शिव और अन्य देवताओं को भी पवित्र करता है। अत: जिसकी मृत्यु निश्चित है, उसे इस नदी की शरण लेनी चाहिए। |
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