श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 19: शुकदेव गोस्वामी का प्रकट होना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  1.19.4 
स चिन्तयन्नित्थमथाश‍ृणोद् यथा
मुने: सुतोक्तो निऋर्तिस्तक्षकाख्य: ।
स साधु मेने न चिरेण तक्षका-
नलं प्रसक्तस्य विरक्तिकारणम् ॥ ४ ॥
 
 
अनुवाद
जब राजा इस तरह पश्चाताप कर रहे थे, तब उन्हें अपनी आने वाली मृत्यु का संदेश मिला, जो ऋषि पुत्र के शाप के अनुसार एक सर्प-पक्षी के काटने से होने वाली थी। राजा ने इसे एक शुभ समाचार के रूप में लिया क्योंकि इससे उन्हें सांसारिक मोह से मुक्ति मिल जाएगी।
 
जब राजा इस तरह पश्चाताप कर रहे थे, तब उन्हें अपनी आने वाली मृत्यु का संदेश मिला, जो ऋषि पुत्र के शाप के अनुसार एक सर्प-पक्षी के काटने से होने वाली थी। राजा ने इसे एक शुभ समाचार के रूप में लिया क्योंकि इससे उन्हें सांसारिक मोह से मुक्ति मिल जाएगी।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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