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श्लोक 1.19.31  |
प्रशान्तमासीनमकुण्ठमेधसं
मुनिं नृपो भागवतोऽभ्युपेत्य ।
प्रणम्य मूर्ध्नावहित: कृताञ्जलि-
र्नत्वा गिरा सूनृतयान्वपृच्छत् ॥ ३१ ॥ |
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| अनुवाद |
| तब प्रखर मुनि श्री शुकदेव गोस्वामी पूर्ण शान्त भाव से बैठ गए। वे बिना किसी हिचकिचाहट के किसी भी प्रश्न का बुद्धिमानी से उत्तर देने के लिए तैयार थे। महान भक्त महाराज परीक्षित उनके पास गए और उन्होंने उनके समक्ष सिर झुकाकर प्रणाम किया। हाथ जोड़कर और मधुर वाणी से उन्होंने विनम्रतापूर्वक पूछा। |
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| तब प्रखर मुनि श्री शुकदेव गोस्वामी पूर्ण शान्त भाव से बैठ गए। वे बिना किसी हिचकिचाहट के किसी भी प्रश्न का बुद्धिमानी से उत्तर देने के लिए तैयार थे। महान भक्त महाराज परीक्षित उनके पास गए और उन्होंने उनके समक्ष सिर झुकाकर प्रणाम किया। हाथ जोड़कर और मधुर वाणी से उन्होंने विनम्रतापूर्वक पूछा। |
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