श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 19: शुकदेव गोस्वामी का प्रकट होना  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  1.19.30 
स संवृतस्तत्र महान् महीयसां
ब्रह्मर्षिराजर्षिदेवर्षिसङ्घै: ।
व्यरोचतालं भगवान् यथेन्दु-
र्ग्रहर्क्षतारानिकरै: परीत: ॥ ३० ॥
 
 
अनुवाद
तब शुकदेव गोस्वामी साधु-संतों, ऋषियों और देवों से इस प्रकार घिरे हुए थे, जैसे चाँद तारों, ग्रहों और अन्य आकाशीय पिंडों से घिरा रहता है। उनकी उपस्थिति अत्यंत शानदार थी और उनका सभी द्वारा सम्मान किया जाता था।
 
तब शुकदेव गोस्वामी साधु-संतों, ऋषियों और देवों से इस प्रकार घिरे हुए थे, जैसे चाँद तारों, ग्रहों और अन्य आकाशीय पिंडों से घिरा रहता है। उनकी उपस्थिति अत्यंत शानदार थी और उनका सभी द्वारा सम्मान किया जाता था।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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