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श्लोक 1.19.2  |
ध्रुवं ततो मे कृतदेवहेलनाद्
दुरत्ययं व्यसनं नातिदीर्घात् ।
तदस्तु कामं ह्यघनिष्कृताय मे
यथा न कुर्यां पुनरेवमद्धा ॥ २ ॥ |
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| अनुवाद |
| [राजा परीक्षित ने मन ही मन विचार किया :] परमेश्वर के आदेशों की अवहेलना करने के कारण आशंका है कि शीघ्र ही कोई कष्ट आने वाला है। अब मैं बिना किसी संकोच के यही चाहता हूँ कि वह कष्ट अभी आ जाए, क्योंकि इस तरह मैं पाप कर्म से मुक्त हो जाऊँगा और फिर ऐसा अपराध नहीं करूँगा। |
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| [राजा परीक्षित ने मन ही मन विचार किया :] परमेश्वर के आदेशों की अवहेलना करने के कारण आशंका है कि शीघ्र ही कोई कष्ट आने वाला है। अब मैं बिना किसी संकोच के यही चाहता हूँ कि वह कष्ट अभी आ जाए, क्योंकि इस तरह मैं पाप कर्म से मुक्त हो जाऊँगा और फिर ऐसा अपराध नहीं करूँगा। |
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