श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 19: शुकदेव गोस्वामी का प्रकट होना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  1.19.2 
ध्रुवं ततो मे कृतदेवहेलनाद्
दुरत्ययं व्यसनं नातिदीर्घात् ।
तदस्तु कामं ह्यघनिष्कृताय मे
यथा न कुर्यां पुनरेवमद्धा ॥ २ ॥
 
 
अनुवाद
[राजा परीक्षित ने मन ही मन विचार किया :] परमेश्वर के आदेशों की अवहेलना करने के कारण आशंका है कि शीघ्र ही कोई कष्ट आने वाला है। अब मैं बिना किसी संकोच के यही चाहता हूँ कि वह कष्ट अभी आ जाए, क्योंकि इस तरह मैं पाप कर्म से मुक्त हो जाऊँगा और फिर ऐसा अपराध नहीं करूँगा।
 
[राजा परीक्षित ने मन ही मन विचार किया :] परमेश्वर के आदेशों की अवहेलना करने के कारण आशंका है कि शीघ्र ही कोई कष्ट आने वाला है। अब मैं बिना किसी संकोच के यही चाहता हूँ कि वह कष्ट अभी आ जाए, क्योंकि इस तरह मैं पाप कर्म से मुक्त हो जाऊँगा और फिर ऐसा अपराध नहीं करूँगा।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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