| श्रीमद् भागवतम » स्कन्ध 1: सृष्टि » अध्याय 18: ब्राह्मण बालक द्वारा महाराज परीक्षित को शाप » श्लोक 47 |
|
| | | | श्लोक 1.18.47  | अपापेषु स्वभृत्येषु बालेनापक्वबुद्धिना ।
पापं कृतं तद्भगवान् सर्वात्मा क्षन्तुमर्हति ॥ ४७ ॥ | | | | | | अनुवाद | | तब ऋषि ने सर्वव्यापी भगवान् से अपने नाबालिग और मूर्ख पुत्र को क्षमा करने की प्रार्थना की, जिसने ऐसे व्यक्ति को शाप देने का महापाप किया था, जो सभी पापों से मुक्त था और पराश्रित एवं सभी प्रकार से रक्षा किये जाने के योग्य था। | | | | तब ऋषि ने सर्वव्यापी भगवान् से अपने नाबालिग और मूर्ख पुत्र को क्षमा करने की प्रार्थना की, जिसने ऐसे व्यक्ति को शाप देने का महापाप किया था, जो सभी पापों से मुक्त था और पराश्रित एवं सभी प्रकार से रक्षा किये जाने के योग्य था। | | ✨ ai-generated | | |
|
|