श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 18: ब्राह्मण बालक द्वारा महाराज परीक्षित को शाप  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  1.18.36 
इत्युक्त्वा रोषताम्राक्षो वयस्यानृषिबालक: ।
कौशिक्याप उपस्पृश्य वाग्वज्रं विससर्ज ह ॥ ३६ ॥
 
 
अनुवाद
ग़ुस्से से आँखें तमतमाते हुए, अपने दोस्तों से कुछ कहकर ऋषि के बेटे ने कौशिक नदी के पानी को छुआ और शब्दों के रूप में वज्र छोड़ दिया।
 
ग़ुस्से से आँखें तमतमाते हुए, अपने दोस्तों से कुछ कहकर ऋषि के बेटे ने कौशिक नदी के पानी को छुआ और शब्दों के रूप में वज्र छोड़ दिया।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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