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श्लोक 1.18.3  |
उत्सृज्य सर्वत: सङ्गं विज्ञाताजितसंस्थिति: ।
वैयासकेर्जहौ शिष्यो गङ्गायां स्वं कलेवरम् ॥ ३ ॥ |
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| अनुवाद |
| तदुपरांत सभी संगियों को त्यागकर राजा ने व्यास पुत्र (शुकदेव गोस्वामी) की शरण ग्रहण की और इस प्रकार वे भगवान की परम स्थिति को समझ सके। |
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| तदुपरांत सभी संगियों को त्यागकर राजा ने व्यास पुत्र (शुकदेव गोस्वामी) की शरण ग्रहण की और इस प्रकार वे भगवान की परम स्थिति को समझ सके। |
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