द्रौपदी च तदाज्ञाय पतीनामनपेक्षताम् ।
वासुदेवे भगवति ह्येकान्तमतिराप तम् ॥ ५० ॥
अनुवाद
द्रौपदी ने भी देखा कि उनके पति, उनकी परवाह किए बिना घर छोड़ रहे हैं। वे भगवान कृष्ण, वासुदेव को सर्वोच्च देवता के रूप में जानती थीं। इसलिए, वे और सुभद्रा दोनों भगवान कृष्ण के ध्यान में लीन हो गईं और अपने पतियों की तरह ही परम गति प्राप्त की।
Draupadi also saw that her husbands were leaving the house without caring for her. She knew Lord Vasudeva Krishna very well. Therefore, both she and Subhadra became absorbed in the meditation of Lord Krishna and attained the same fate as their husbands.
तात्पर्य
हवाई जहाज उड़ाते समय कोई दूसरे जहाज़ की देखभाल नहीं कर सकता। प्रत्येक को अपने जहाज़ की देखभाल स्वयं करनी होती है, और यदि कोई ख़तरा हो तो उस हालत में कोई भी जहाज़ दूसरे की मदद नहीं कर सकता। ठीक उसी तरह, जीवन के अंत में, जब किसी को घर वापस जाना होता है, भगवान के धाम को लौटना होता है, तो प्रत्येक को बिना किसी की मदद के स्वयं का ध्यान रखना होता है। हालाँकि, अंतरिक्ष में उड़ान भरने से पहले, ज़मीन पर मदद की पेशकश की जाती है। इसी तरह, जीवनकाल के दौरान, आध्यात्मिक गुरु, पिता, माता, रिश्तेदार, पति और अन्य सभी मदद कर सकते हैं, लेकिन समुद्र पार करने के दौरान प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं अपना ध्यान रखना होता है और पहले प्राप्त निर्देशों का उपयोग करना होता है। द्रौपदी के पाँच पति थे और किसी ने भी द्रौपदी से आने के लिए नहीं कहा था; द्रौपदी को अपने महान पतियों की प्रतीक्षा किए बिना स्वयं अपना ध्यान रखना था। और क्योंकि वह पहले से ही प्रशिक्षित थी, वह तुरंत भगवान वासुदेव, कृष्ण, भगवान के व्यक्तित्व के चरण-कमलों पर ध्यान केंद्रित करने लगी। ठीक उसी तरह, पत्नियों को भी अपने पतियों के समान ही फल प्राप्त हुए; कहने का अर्थ है कि वे अपने शरीर को त्यागे बिना भगवत्ता तक पहुँच गईं। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर बताते हैं कि द्रौपदी और सुभद्रा दोनों को, हालाँकि यहाँ उनका नाम उल्लेखित नहीं है, समान फल मिले। उनमें से किसी को भी शरीर नहीं छोड़ना पड़ा।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥